डॉ विजय गर्ग
इंसान अपने जीवन में बहुत कुछ खोकर भी पुनः प्राप्त कर लेता है। धन, अवसर, मित्रता या पद। लेकिन एक नुकसान ऐसा होता है जो कभी पूरा नहीं हो पाता। माता-पिता का विच्छेद। माता- पिता ऐसे होते हैं जिनके छाया के नीचे बच्चा निर्भीक होकर बढ़ता है। जब यह छाया हट जाती है, तो जीवन की धूप काफी तेज महसूस होती है।
माँ की ममी और पिता की कठोरता दोनों ही बच्चे के चरित्र का आधार बनते हैं। माँ बिना कहे दिल की बात समझ लेती है, जबकि पिता जीवन भर अपनी इच्छाओं को त्यागकर बच्चों के सपनों को साकार करने में लगे रहते हैं। अक्सर हम बड़े होकर उनके बलिदान को समझते हैं, लेकिन कभी-कभी तब तक बहुत देर हो जाती है।
आधुनिक युग में दौड़-धूप, रोजगार की चिंताओं और मोबाइल दुनिया ने पारिवारिक संबंधों में दूरी पैदा कर दी है। बच्चे घर पर रहते हुए भी अपने माता-पिता से बात करने के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। कभी-कभी बड़े बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं। यह हमारी सामाजिक सोच के लिए चिंता का विषय है। हमें समझना होगा कि माता-पिता की सेवा और सम्मान केवल कर्तव्य नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति का दृष्टिकोण है।
जब माता-पिता हमारे साथ होते हैं, तो उनकी सराहना की जानी चाहिए। उनके साथ बिताया गया एक छोटा सा पल भी कल के लिए अविस्मरणीय याद बन जाता है। एक मीठा शब्द, एक स्नेही मुस्कान या थोड़ा समय यह सब उनके लिए बेहद कीमती होता है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि माता-पिता हमारे जीवन का पहला पाठशाला हैं। उनके दूसरे में असीम शक्ति होती है। यदि हम आज उनकी सराहना करेंगे, तो कल हमारे बच्चे भी हमें वही सम्मान देंगे।
अंत में, यह सत्य हमेशा याद रखना चाहिए—दुनिया में सब कुछ बदल सकता है, लेकिन माता-पिता नहीं। इसलिए जब तक वे हमारे साथ हैं, उनकी सेवा करना, उनका सम्मान करना और उन्हें प्यार करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। क्योंकि माता-पिता को फिर से नहीं खोजा जाना चाहिए
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब











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