तुमने ऐसा भी कोई मसीहा देखा है क्या,
जख्म देकर जो पूछा हुआ क्या है
ना जी ना.. ना.. ए गल्लां बिल्कुल गलत हैं। एक तरफ तो सैनी सरकार ने रात के अंधेरे में एक साथ हरियाणा के पांच होनहार आईएएस अफसरों पर चुपके से सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया। उनको अचानक आसमान से जमीं पर कर दिया और उस पर सितम ये कि ये मान भी नहीं रहे कि हम ने बैंक स्कैम की आड़ में इनको जख्म दे दिया। ये कांड कर दिया। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से जब इन अफसरों के तबादले पर पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने कहा कि ये तबादले तो रूटीन की प्रक्रिया हैं। इसी तरह से सरकार के एक अन्य सीनियर अधिकारी अपने एक इंटरव्यू में कह रहे थे कि आईएएस अफसर को न तो कोई राज्य सरकार नौकरी से हटा सकती और ना ही तनख्वाह कम कर सकती। ज्यादा से ज्यादा तबादला कर सकती है। और तबादला कोई सजा नहीं होती। ये बातें जितनी सुनने में कर्णप्रिय-आदर्शवादी लगती हैं, उतना हकीकत से इनका दूर दूर तक का भी नाता नहीं होता। इस माहौल पर कहा जा सकता है..
खैरियत पूछ के वो कैसी सजा देता है
जब भी मिलता है मेरा दर्द बढा देता है
एक समय ये सब किश्ती,मांझी,पतवार,सवार थे
बहराल असल मुददे पर लौटते हैं। हरियाणा सरकार ने जिन पांच आईएएस अफसरों को खुडडेलाइन लाइन लगाया है वो एक समय सरकार के आंख, कान,नाक तो होते ही थे साथ ही आंख,कान और नाक का बाल भी होते थे। इस से आप इनकी सरकार से नजदीकियों की कल्पना कर सकते हैं। जब सरकार ने इन से ही दूरी बना ली है तो मतलब वो वक्त आने पर किसी से भी दूरी बना सकती है। अक्सर ऐसा कहा भी जाता है कि सरकार में कोई भी व्यक्ति इनडिस्पनसेबल यानी अनिवार्य-अपरिहार्य नहीं होता। इन पांच अफसरों में से कुछ ऐसे भी थे कि पावर की पपड़ी पाकर अपने को खुदा से बढ कर समझने लग गए थे। हर किसी की चूड़ी टाइट करने को अपना मौलिक अधिकार समझने लग गए थे। आदमी को आदमी नहीं समझते थे। मगर ये वक्त है। ये बदलता जरूर है। और जब बदलता है-जब वक्त इंसाफ करता है तो फिर इसे ना वकीलों की जरूरत पड़ती है और ना दलीलों की। इसलिए कभी भी पावर पाकर इतराए मत। हमेशा पैर जमीन पर रखें। वक्त से हमेशा डर कर रहे। इनके हश्र से अन्य अफसर भी सबक ले सकते हैं कि वे कायदे से रहें और आपे में रहें। छलक छलक ना जाएं। झलक झलक ना जाएं। पावर मिली है तो उसे पचाना सीखें। इनकी अदाओं को नमन करते हुए यही कहा जा सकता है.
दरिया राह भुला बैठे,साहिल भी खो जाएमांझी ही किश्ती को डुबोए तो मुसाफिर क्या करे
कब तक साइडलाइन रहेंगे?
ऐसा कहा जाता है कि एसीबी की जांच में इन अफसरों के नाम आए थे और सरकार ने इनके तबादले कर दिए। अब रोचक तथ्य ये है कि इनका तबादला तो कर दिया…लेकिन बड़ा सवाल ये है कि ये अफसर कब तक इन खुडडेलाइन पदों पर बने रहेंगे? क्या से अफसर जल्द ही मुख्यधारा में तो वापस नहीं आए जाएंगे? दूसरा बड़ा सवाल ये है कि एसीबी के हत्थे चढे कुछ अदने कर्मचारियों -स्कैम के सूत्रधारों ने तोते की तरह बक दिया कि उन्होंने तो बैंक वालों को सरकार का पैसा अपने फलां फलां विभागीय अध्यक्ष या प्रशासकीय सचिव के कहने से दिया था। अब एसीबी ने इस जुर्म में इन छोटे कर्मचारियों को तो पकड़ कर जेल में उकड़ू बिठा दिया है,लेकिन इस जुर्म को करने वाले आला अधिकारियों की तरफ अभी तक रूख नहीं किया है। उधर सरकार ने अब इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है। सीबीआई वाले तो पहले ही इस तरह के मामलों को हाथों हाथ लपकने के लिए बने हुए हैं। वो अब अपने आप इन आरोपियों से हिसाब कर लेंगे। वो इन से भरपूर इंसाफ कर लेंगे। अगर किसी छटे छटाए को जांच मिल गई तो वो तो अपने आप सबको निचोड़ लेंगे। हो सकता है कि आखिर में इन सबको क्लीन चिट भी मिल जाए,लेकिन तब तक इनके मन मस्तिष्क में अंजाना सा डर तो बैठा ही रहेगा? हालांकि इनको लगता है कि वो सरकारी एजेसियों के हत्थे नहीं चढेेंगे,लेकिन इनको याद रखना चाहिए कि..
कातिल ने किस सफाई से धोई है आस्तीन
उसको खबर नहीं कि लहू बोलता भी है
जो असली मास्टरमाइंड हैं, क्या उन पर एक्शन होगा?
एक सवाल ये भी है कि हरियाणा सरकार ने जिन अफसरों को खुडडेलाइन लगाया है क्या वो सरकार का इनके खिलाफ अंतिम एक्शन है या इस मामले में अभी और भी बहुत कुछ किया जाना-होना बाकी है। बताते हैं कि अभी कुछ अन्य प्रभावशाली आईएएस अफसरों के नाम भी इस बैंक स्कैम में शामिल हैं,लेकिन अभी तक वो किसी तरह से खुद को सुरक्षित बचाए-बनाए हुए हैं। बहरहाल अफसरशाही में इन अफसरों को खुडडेलाइन लगाए जाने पर मिश्रित सी प्रक्रियाएं हैं। कुछ का कहना है कि सरकार का पैसा बैंक को गया और बैंक वालों ने इसे ब्याज समेत सरकार को वापस कर दिया तो इसमें स्कैम क्या हुआ? सरकार की तो एक पाई नहीं डूबी। खेल तो इन बैंक वालों के स्टाफ ने किया है जिन्होंने इस पैसे को इधर उधर कर दिया। कुछ लोग ये भी फरमा रहे हैं कि बैंक स्कैम की आड़ में सरकार ने कुछ अफसरों पर हाथ साफ कर दिया। असल में चौटाला सरकार के बाद से हरियाणा की अफसरशाही कुछ ज्यादा ही निरंकुश और बेलगाम सी हो गई है। उनको गलती करने पर कायदे से सरकार के कर्णधारों ने ना तो टोका और ना ही रोका। इन पर मनमर्जी हावी होती चली गई है। जो खौफ और फालोअप चौटाला सरकार में मुख्यमंत्री सचिवालय से हुआ करता था वो फिर बाद के बरसों में गायब सा होता चला गया। हालांकि भाजपा सरकार ने सीएम विंडो,विजिलेंस ब्यूरो और राइट टू सर्विस कमीशन के जरिए प्रशासनिक जवाबदेही फिक्स करने की कोशिश तो की है,लेकिन इस दिशा में अभी तक काफी काम किया जाना है। राइट टू सर्विस कमीशन भी व्यक्ति सेंटरिक ज्यादा हो गया है। अब इस कमीशन में टीसी गुप्ता जैसे धुरंधर चीफ कमिश्नर हैं तो ये प्रभावी हो गया है,लेकिन कल को अगर कोई सोफ्ट व्यक्ति इसका मुखिया बन गया तो फिर यहां भी माहौल हरियाणा सरकार जैसा सा हो जाएगा कि किसी का काम कर दिया तो ठीक और नहीं किया तो ठीक।
व्यक्ति की बजाय सिस्टम सेंट्रिक हो
अभी भी सरकारी कार्यालयों मे बहुत से कामों को ना करना,आब्जैक्शन लगाना,टरकाना,लटकाना,भटकाना या फाइल को दाब कर बैठने को ही सरकारी कामकाज माना जाता है। जिसकी जैसी हैसियत वो काम ना करने को ही सरकारी कामकाज मान कर इसे शिददत से करने में जुटा है। उसको लगता है कि काम ना करना ही सरकारी कामकाज है और काम करना मतलब किसी पर निजी अहसान करना है। अगर किसी क्लर्क,असिस्टेंट की पावर किसी छोटे काम को लटकाने की है तो वो इसे बड़े चाव से,बिना किसी डर के और हक से कर रहा है। अगर किसी विभागाध्यक्ष-प्रशासकीय सचिव की हैसियत किसी बड़े काम को चक्करी कटाने की है तो वो निसंकोच होकर ये काम कर रहा है। बिना बात के आब्जैक्शन ठोक रहा है। वो सब कर रहा है सिवाय किसी काम को सिरे चढाने के। हालांकि यंू सारे का सारा मामला भी एक जैसा नहीं है। सभी के सभी दूध के धुले हों ऐसा भी नहीं है और सभी के सभी कामों कामों को रोकते हों,ऐसा भी नहीं हैं। कुछ कर्मचारी और अफसर आज भी हरियाणा सरकार में वाकई में बहुत ही अच्छे हैं। वो पुण्य आत्माएं अपने दरवाजे पर आने वाले हर किसी शख्स का काम बिना किसी अपेक्षा के करते हैं। पोजिटिव रहते हैं। पोजिटिव करने की कोशिश करते हैं। फिर भी अंत में यही कहा जाएगा कि सरकार में अब भी काफी गदरफंड है। काफी सुधार तो हो लिया,लेकिन अभी भी काफी कुछ..बहुत कुछ किया जाना बाकि है। सरकारी आफिस में आई
एक-एक पीयूसी को निपटाने की दिशा में गंभीरता से काम किए जाने की जरूरत है। प्रक्रियाओं-व्यवस्थाओं को व्यक्ति सेंट्रिक नहीं,सिस्टम सेंट्रिक बनाने की जरूरत है। सरकारी कार्यालयों में दिए जाने वाली सेवाओं-निपटान के लिए टाइमबाउंड जरूरी फालोअप-मोनिटरिंग किए जाने की जरूरत है। एक व्यक्ति को ये अपेक्षा हो और उसकी अपेक्षा सच्ची हो कि अगर सरकार में उसका कोई काम होना है-सरकार से उसको कोई मदद-सहायता-फंड-बिल मिलना है तो वो तय समय में मिल जाएगा। इसके लिए उसको हर सीट पर जाकर बाबूओं के तरले नहीं करने होंगे। उसकी ठोढी को सहलाना नहीं होगा। उनको उनका कमीशन-कट नहीं देना होगा। जो जायज है वो बिना सिफारिश के, बिना रिश्वत के मिल जाएगा। उसको इसके लिए कहीं चक्कर काटने की जरूरत नहीं है। इस माहौल पर कहा जा सकता है..
खुदा के वास्ते इस को न टोको
यही इक शहर में अब कातिल बचा है
पैसे देकर काम हो जाए तो इस से बेहतर क्या है?
हमारी इस तुच्छ सी सोच पर एक सीनियर अधिकारी तंज करते हुए कह रहे थे कि आप भी किसी जमाने में रह रहे हो। अगर पैसे देकर भी सरकार में समय पर काम हो जाए-किसी जरूरतमंद को इसका हक मिल जाए तो इस से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। समझदार लोग तो अपने कामों के लिए सिफारिश करवाने-ढंूढने में समय बर्बाद ही नहीं करते। वो तो सीधा करारे करारे गांधीछाप के जरिए काम को करते-करवाते हैं और मस्त रहते हैं। आप इन सज्जन से कितना सहमत हैं? इस माहौल पर कहा जा सकता है..
जख्मों को मरहम कहता हंू,कातिल को मसीहा कहता हंू
जो दिल पर गुजरा करती है मैं पर्दा पर्दा कहता हंू
जुल्फों को बादल कहता हंू,रूखसार को शोला कहता हंू
तुम जितने अच्छे लगते हो मैं उस से अच्छा कहता हंू
अब रीत यही है दुनिया की तुम भी न बनो बेगाना कहीं
इल्जाम नहीं धरता तुम पर इक जी का धड़कना कहता हंू
अरबाब ए चमन जो कहते हैं वो नाम मुझे मालूम नहीं
जिस शाख पर कोई फूल न हो मैं उस को तमन्ना कहता हंू









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