आरके गर्ग, चंडीगढ़
एक छोटी-सी घटना जीवन का बड़ा सत्य समझा देती है। एक पत्नी ने अपने पति से कहा—“कल छुट्टी ले लेना।” पति ने बिना कोई सवाल किए सहजता से उत्तर दिया—“ठीक है।” पत्नी ने आश्चर्य से पूछा—“कारण नहीं पूछोगे?” पति मुस्कुराया और बोला—“जहाँ पूरा विश्वास होता है, वहाँ कारण नहीं पूछा जाता।”
यह साधारण-सा संवाद आज के समाज के लिए एक गहरा संदेश देता है। विश्वास वह अदृश्य धागा है, जो रिश्तों, परिवारों, संस्थाओं और पूरे समाज को जोड़कर रखता है। जब विश्वास होता है, तो शब्दों की आवश्यकता कम पड़ जाती है। लेकिन जब विश्वास कमजोर पड़ने लगता है, तो हर बात पर सवाल, संदेह और दूरी पैदा होने लगती है। दुर्भाग्य से आज हमारा समाज इसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ विश्वास कम हो रहा है और अहंकार बढ़ता जा रहा है।
कभी भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत आपसी भरोसा और सम्मान था। परिवारों में निर्णय बिना बहस के नहीं, बल्कि आपसी समझ से होते थे। पड़ोसी परिवार जैसे होते थे। रिश्तों में औपचारिकता नहीं, अपनापन होता था। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में बिना बुलाए शामिल होते थे। कारण सिर्फ एक था—विश्वास।
आज स्थिति बदल चुकी है। परिवारों में संवाद कम और तर्क अधिक हो गए हैं। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों के बीच भी संदेह की दीवारें खड़ी होने लगी हैं। दोस्ती में स्वार्थ आ गया है और सामाजिक संबंधों में औपचारिकता बढ़ गई है। इसका सबसे बड़ा कारण है—अहंकार।
अहंकार इंसान को भीतर से खोखला कर देता है। जब व्यक्ति स्वयं को सर्वोपरि मानने लगता है, तब उसे दूसरों की भावनाएं, विचार और सम्मान महत्वहीन लगने लगते हैं। उसे लगता है कि वही सही है और बाकी सब गलत। यही सोच धीरे-धीरे रिश्तों को तोड़ती है।
अहंकार व्यक्ति को सुनने नहीं देता, केवल बोलने पर मजबूर करता है। वह संवाद नहीं, वर्चस्व चाहता है।
आज यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं में भी साफ दिखाई देता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है, क्योंकि सवाल जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। लेकिन जब हर निर्णय को केवल विरोध की दृष्टि से देखा जाए, हर व्यक्ति पर केवल संदेह किया जाए, तो समाज में अस्थिरता बढ़ती है। इसी प्रकार जब सत्ता में बैठे लोग आलोचना को अपमान समझने लगें और अहंकारवश संवाद बंद कर दें, तब व्यवस्था कमजोर हो जाती है।
अत्यधिक अविश्वास भी उतना ही खतरनाक है जितना अत्यधिक अहंकार। यदि नागरिक हर संस्था पर संदेह करेंगे, हर रिश्ते में शक ढूंढेंगे, हर निर्णय में षड्यंत्र देखेंगे, तो सामाजिक संतुलन बिगड़ जाएगा। वहीं यदि नेता, अधिकारी या परिवार का मुखिया अहंकार में निर्णय लेने लगे और दूसरों की बात सुनना बंद कर दे, तो वह भी विनाश का कारण बनता है।
इतिहास इस सत्य का साक्षी है। रावण का पतन केवल उसकी शक्ति से नहीं, उसके अहंकार से हुआ। महाभारत में दुर्योधन का विनाश उसकी जिद और अभिमान का परिणाम था। विश्व इतिहास में भी अनेक साम्राज्य इसलिए समाप्त हुए क्योंकि शासकों ने विनम्रता छोड़ दी और स्वयं को अजेय मान लिया। अहंकार हमेशा व्यक्ति को वास्तविकता से दूर कर देता है।
इसके विपरीत, विश्वास ने समाजों को जोड़ा है। महात्मा गांधी का नेतृत्व इसलिए प्रभावी था क्योंकि लोगों को उन पर विश्वास था। परिवार इसलिए टिके रहते हैं क्योंकि उनमें भरोसा होता है। व्यापार इसलिए चलता है क्योंकि ग्राहक और व्यापारी के बीच विश्वास होता है। न्याय व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनता को न्याय पर विश्वास होना चाहिए।
आज आवश्यकता संतुलन की है। न अंधा विश्वास उचित है, न अंधा अविश्वास। न अहंकार समाधान है, न हर बात में संदेह। हमें विवेकपूर्ण विश्वास और विनम्र व्यवहार की संस्कृति विकसित करनी होगी। सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि पद स्थायी नहीं, जिम्मेदारी स्थायी है। उन्हें अहंकार छोड़कर जवाबदेही और संवेदनशीलता अपनानी होगी। वहीं जनता को भी आलोचना के साथ धैर्य, समझ और संतुलन बनाए रखना होगा।
परिवारों में भी यही सिद्धांत लागू होता है। यदि माता-पिता बच्चों पर केवल नियंत्रण रखेंगे और विश्वास नहीं देंगे, तो दूरी बढ़ेगी। यदि बच्चे केवल अधिकार मांगेंगे और सम्मान नहीं देंगे, तो संबंध कमजोर होंगे। यदि पति-पत्नी हर बात में तर्क जीतना चाहेंगे, तो रिश्ता हार जाएगा। रिश्ते जीतने से नहीं, निभाने से चलते हैं।
समाज और राष्ट्र दोनों की मजबूती का आधार विश्वास है। विकास केवल सड़कों, इमारतों और योजनाओं से नहीं होता; विकास तब होता है जब लोगों के मन जुड़ते हैं।
विश्वास जोड़ता है, अहंकार तोड़ता है। विनम्रता पुल बनाती है, अभिमान दीवारें खड़ी करता है।
अंततः प्रश्न यही है कि हम किस दिशा में जाना चाहते हैं—जोड़ने की ओर या तोड़ने की ओर। क्योंकि भविष्य उसी का होता है, जो संबंधों को सहेजना जानता है, संवाद को महत्व देता है और विश्वास की शक्ति को समझता है।
याद रखिए—
अहंकार तोड़ता है, विश्वास जोड़ता है।
और समाज की असली परीक्षा इसी में है कि वह अहंकार को त्यागकर विश्वास को कितना अपनाता है।












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