April 20, 2026 7:09 pm

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आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

उस के वादे का अब भी यकीन करता हंू,
… हजार बार जिसे आजमा लिया मैंने
हिंदुस्तान के अंतिम सुल्तान बहादुरशाह जफर ने कभी लिखा था…

ये चमन यंू ही आबाद रहेगा और हजारों बुलबुलें अपनी बोलियां बोल कर उड़ जाएंगी। ऐसा ही हमारा एक प्यारा और न्यारा सा चमन है गुरूग्राम। यहां कई सरकारों से विकास के नाम पर गदरफंड मचा हुआ है। जो भी सरकारें आती हैं,जो भी बुलबुलनुमा नेता, अफसर, कर्मचारी यहां आते हैं, वो अपनी बोलियां बोलकर-अपना हिस्सा चुग कर-अपना उल्लू सीधा कर उड़न छंू हो जाते हैं। फिर किसी अन्य शहर में किसी अन्य डाल पर बैठ अपनी बोली गुनगुनाने लग जाते हैं। यहां से हासिल किया समृद्ध अनुभव किसी और शाख पर दोगुने जोश से आजमाते हैं। हालांकि सारी बुलबुलें एक जैसी नहीं होती। भूले भटके से कभी कभी कुछ कुछ तो ऐसी पुण्य आत्माएं भी आ जाती हैं जो सिर्फ अपने वेतन से ही काम चलाती हैं। गुड़गांव का नाम ग्रुरूग्राम करने के बाद देश की जनता की तरह मैं भी पूर्णत: आश्वस्त हो गया था कि अब इस मिलेनियम सिटी के नागरिकों को सब तकलीफों से छुटकारा मिल जाएगा। अब ना यहां टैÑफिक जाम लगेगा और ना ही सड़कों पर पशु दिखेंगे। सफाई व्यवस्था और कानून व्यवस्था सब चकाचक हो जाएगी। बरसात में यहां पानी खड़ा नहीं होगा। सब धन्य हो जाएंगे। सरकार के मंगलगीत गाएंगे। अफसोस ऐसा हो ना सका। छोटी सी बरसात बड़ा दर्द दे जाती है और काफी समय तक वाहनों के जाम लगने की नौबत आ जाती है। काफी समय तक जलभराव रहता है।

इस तरह के वीडियो और खबरें विदेशी मीडिया में भी प्रमुखता से छपे-दिखे। हाल ही में मेरा गुरूग्राम जाना हुआ। मैं ये सोच कर काफी हर्षित था कि अब तो गुरूग्राम काफी बदल गया होगा। मगर ये सब मेरी कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं था। जैसा पहले था, लगभग वैसा ही आज है। कुछ कुछ स्थानों पर सफाई व्यवस्था में जरूर सुधार हुआ है,लेकिन बाकि वही ढाक के तीन पात हैं। गुरूग्राम और फरीदाबाद रोड़ पर यंू ही कंस्ट्रक्शन एंड डैमोलिशन वेस्ट-सीएडी जगह जगह पर बिखरा हुआ है। गुरूग्राम की समस्याओं के निवारण के लिए उच्च स्तरीय मीटिंगों में जो जो फैसले हुए थे उनमें से ज्यादातर सरकारी फाइलों में नीचे से ऊपर चक्कर काट रहे हैं हालात ऐसे हैं कि लेण देण को कुछ नहीं और नाम है दानवीर ज्ञानचंद। जैसे कि कचरे से बिजली बनाने के लिए वेस्ट टू एनर्जी प्लांट लगाने का फैसला हुआ था। एक फरीदाबाद में बनना था और गुरूग्राम-मानेसर के लिए मानेसर में लगना था। अभी तक ये मामला फाइलों में ही भटक रहा है। एक और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए मुख्यमंत्री ने करीब दो बरस पहले मंजूरी दी थी,लेकिन आज तक इस पर एक र्इंट नहीं लग पाई। रिहायशी आवासों से कूड़ा उठाने की व्यवस्था लागू की जाने के बारे में तय हुआ था। इसके लिए टेंडर होना था। इसके लिए टेंडर की शर्ते रिक्वसेट फार प्रपोजल-आरएफपी में छह दफा बदलाव हो चुका है। मगर फाइनल अभी तक कुछ ना हुआ। नीचे से प्रस्ताव बना कर सरकार को भेज दिया जाता है और फिर वहां से कोई न कोई ज्ञानचंद ज्ञान पेल देता है और फाइल फिर नीचे आ जाती है। अब पता नहीं क्या माजरा है? किसी खास कंपनी को फायदा पहुंचाने टेंडर देने के लिए ही आरएफपी बनाई जाने की कवायद चल रही हो..ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन ये काम काफी समय से लटका क्यों हुआ है,कहा नहीं जा सकता। आखिर वो कौन है जिसका इंटरैस्ट पूरा नहीं हो रहा तो इतने लंबे समय से टेंडर की शर्ते तक भी फाइनल नहीं हो पा रही? इस हालात पर कहा जा सकता है..

कुछ होगा या कुछ न होगा,
अगर मैं बोलूगां
न टूटे,न टूटे तिलिस्म सत्ता का
मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा

ना ग्रीन है, ना बैल्ट
कूड़ा उठाने के लिए करीब 400 गाड़ियां-ट्रालियां तो जरूर मैदान में उतारी गई हैं। टैÑक्टरों के जरिए इन से कूड़ा उठाया जाता है। अगर ये ट्रैक्टर देर से आएं तो इन ट्रालियों में कूड़ा लबालब हो जाता है और लोग इधर उधर कूड़ा फेंकने लग जाते हैं। हम नागरिकों ने भी ये मान ही लिया है कि शहर की सफाई व्यवस्था, इसे सजाना संवारना सरकार का ही काम है और हमारा इस नेक काम से कोई नाता नहीं है। लिहाजा सरकारें जैसी होती हैं वो हमको पता ही है और हम जो हैं उसका तो कहना ही क्या। सरकार और नागरिक दोनों ही मिल कर गजब ढा रहे हैं। सड़कों के बारे में कहा ही क्या जाए। कहां से शुरू होकर अचानक से सड़क बीच राह में कहां खत्म हो जाएगी या अचानक से गडडो में तबदील हो जाएगी, कहा नहीं जा सकता। मार्किटों में पार्किग व्यवस्था का बुरा हाल है। बहुत सी जगह तो मार्किट में आने के मुख्य रास्ते में ही न केवल गडडे हैं, बल्कि वहां कीचड़नुमा बदबूदार काला पानी आपके शानदार स्वागत और मोहब्बत का इजहार करने के लिए साक्षात तौर पर हाजिर है। जिन दोपहिया वाहनों को ये अंदाजा नहीं होता कि सरकार कितनी शिददत से उन पर अपना प्रेम लुटाने के लिए व्याकुल है वो लोग अक्सर गलत अनुमान लगा जाते हैं और इन गडडों में अपने दोपहिया वाहन समेत डुबकी लगा जाते हैं। विदेशों में सरकार मार्किट को खुशबूदार ताजे फूलों से सजा कर रखती है और हमारे यहां बदबूदार पानी से स्वागत होता है। फिर ये अचरज होता है कि हमारे ये होनहार अफसर सरकारी खर्च पर विदेशों से क्या पढ कर आते हैं? क्या यहीं ट्रेनिंग वो बाहर से लेकर आते हैं? सड़कों के किनारे पर ग्रीन बैल्ट पर अवैध कब्जे बरकरार हैं और जहां अवैध कब्जे नहीं हैं वा ना ये ग्रीन बची है और ना बैल्ट। इनको तो लोगों ने कूड़ा डालने के लिए सोफ्ट टारगेट बना लिया है। बहुत से स्थानों पर सड़क किनारे मेनहोल अभी भी खुले हैं और इन पर या तो ढक्कन नहीं हैं या फिर ये आधे अधूरे लगे हैं। मानों सरकार ने अपनी लाचारी और विवशता जाहिर करते हुए जनता से दो टूक कह दिया हो कि हम एक मेनहोल में एक दफा एक ही आदमी को गिरने का मौका दे सकते हैं। हम से ज्यादा उम्मीद ना लगाएं। ये मत सोचें कि हम इतने इतने बड़े मेनहोल बनाएंगे-उनको बिना ढक्कन के छोड़ जाएंगे, जिसमें एक साथ एक वक्त में दो से तीन लोग समा सकें। हम तो एक वक्त में सिर्फ एक आदमी को ही ये सेवा देने में सक्षम हैं। शहर में अभी भी पशुओं खासकर गायों का आतंक बरकरार है। किसी भी गली-चौराहे पर पोलिथीन चबाती गायों का झुंड आप के स्वागत,आपको सींग चुभोने,आप से लड़ने भिड़ने, आपकी गाड़ी को टक्कर मारने के लिए मौजूद है। जब कभी नगर निगम वाले इस मामले में एफआईआर दर्ज करवाते हैं तो ये भी हो जाता है कि इन गायों के मालिक इन निगम वालों को धमकाते हैं और अगर कोई कमजोर सा मिल जाए तो उस पर हाथ साफ भी कर जाते हैं। इस हालात पर कहा जा सकता है..

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हंू
मैं तेरी यादों का जाम पी लेता हंू
मेरे चाहने वाले भी तकलीफ में आ जाते हैं
मैं जो कुछ देर को आराम पहन लेता हंू
रात को ओढ कर सो जाता हंू दिन भर की थकन
सुबह को फिर से कोई काम पहन लेता हंू

ट्रैफिक व्यवस्था बदहाल
ये जरूर सुधार हुआ होगा कि पहले जहां जलभराव होने पर पानी की निकासी करवाने में मान लीजिए 180-200 मिनट लगती थी, वहां हो सकता है कि अब 100 मिनट में ये कार्यक्रम सम्पन्न हो जाए। टैÑफिक जाम की समस्या यथावत बरकरार है। जैसे कि 10 अप्रैल, रात्रि 9: 40 बजे गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड़ से गोल्फ कोर्स रोड़ पर मुड़ते ही करीब 30 मिनट का जाम लगा था। इस जाम का कोई ठोस कारण नहीं था। गोल्फ कोर्स रोड़ पर आगे एक कट से दाएं और बाएं जाने वाले वाहन चालकों में इस कद्र जोश और जज्बा ठाठें मार रहा था कि उन्होंने तीन तरफ यानी दाएं-बाएं और आगे जाम लगा दिया। कोई यहां व्यवस्था संभालने वाला नहीं दिखा। अगर रात को ट्रैफिक व्यवस्था का ये बुरा हाल है तो पीक आवर में क्या होता होगा? अब ऐसा भी नहीं है कि सरकार के कर्णधार इस हालात से वाकिफ ना हो। नगर निकाय मंत्री विपुल गोयल ने पिछले दिनों गुरूग्राम के सरकारी विश्राम गृह में इस मुददे पर एक मीटिंग भी की। अब सरकारों में ऐसी मीटिंग होती ही रहती हैं। जब से सरकारें अस्तित्व में आई हैं तब से इस तरह की मीटिंग की परंपरा चली आ रही है। अब जबकि कुछ समय बाद मानूसन सीजन आने वाला है तो आप संयम और धैर्य बनाए रखें। सब कुछ सरकार पर ही ना छोड़ें। कुछ प्रयास खुद भी करें। प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। प्रार्थना करें कि ईश्वर रहम करे और कम बारिश बरसे ताकि सिस्टम की ज्यादा पोल ना खुले। गुरूग्राम की बहादुर जनता की हालत पर कहा जा सकता है..

जख्म खाते हैं और मुस्कराते हैं हम
हौसला अपना खुद आजमाते हैं हम
हम जो डूबें तो कोई न बच सके
ऐसा सागर में तूफान उठाते हैं हम

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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