डॉ. विजय गर्ग
लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि उसकी असली ताकत दो महत्वपूर्ण pillars पर टिकी होती है—पत्रकारिता और राजनीतिक संवाद। यदि पत्रकारिता सच दिखाने का काम करती है, तो राजनीति समाज को दिशा देने का कार्य करती है। जब इन दोनों में गिरावट आने लगती है, तो पूरा democratic system प्रभावित होता है। आज भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में यह चिंता गहराती जा रही है कि journalism अपने मूल मूल्यों से दूर होती जा रही है और politics में भाषा का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है।
यह केवल profession का crisis नहीं है, बल्कि समाज के चरित्र का भी सवाल है। जब सच कमजोर पड़ता है और शब्द घायल हो जाते हैं, तब जनता का भरोसा टूटता है, संस्थाएं कमजोर होती हैं और लोकतंत्र खोखला होने लगता है।
पत्रकारिता का बदलता चेहरा
एक समय था जब पत्रकारिता को मिशन माना जाता था। पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था, आम जनता की आवाज बनता था और समाज के सामने सच को निर्भीकता से रखता था। उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। लेकिन आज यह तस्वीर तेजी से बदल रही है।
24/7 news cycle और digital media के दौर में खबरों की race इतनी तेज हो गई है कि speed ने accuracy को पीछे छोड़ दिया है। Breaking News की होड़ में कई बार facts की पुष्टि नहीं की जाती। sensational headlines, clickbait और आधी-अधूरी जानकारी के सहारे audience को attract करने की कोशिश की जाती है।
आज कई media houses के लिए TRP और engagement ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। गहराई से की गई investigative reporting की जगह instant reaction journalism ने ले ली है। खबर अब public service कम और commercial product ज्यादा बनती जा रही है।
Paid News भी एक गंभीर समस्या है। जब विज्ञापन revenue पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, तो editorial independence प्रभावित होती है। कई बार राजनीतिक या corporate interests के दबाव में reporting का स्वर बदल जाता है। ऐसे में पत्रकारिता और propaganda के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
मीडिया का ध्रुवीकरण
एक और गंभीर चुनौती media polarization है। आज कई news platforms खुले तौर पर ideological camps में बंट चुके हैं। कुछ channels केवल एक विचारधारा को मजबूत करते हैं, जबकि दूसरी तरफ विरोधी narrative को बढ़ावा दिया जाता है।
इससे audience केवल वही सुनती है जो वह पहले से मानती है। इसे echo chamber effect कहा जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि समाज में संवाद कम और टकराव ज्यादा बढ़ता है। पत्रकारिता का उद्देश्य विविध दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है, लेकिन जब media खुद पक्षधर बन जाए, तो यह भूमिका कमजोर पड़ जाती है।
सच की जगह perception हावी होने लगता है। लोग facts से ज्यादा feelings पर भरोसा करने लगते हैं। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
राजनीति की भाषा में गिरावट
जहां पत्रकारिता कमजोर हुई है, वहीं राजनीति की भाषा भी चिंताजनक रूप से बदल गई है। लोकतंत्र में राजनीतिक बहस विचारों, नीतियों और जनहित के मुद्दों पर आधारित होनी चाहिए। लेकिन आज अक्सर यह व्यक्तिगत हमलों, आरोप-प्रत्यारोप और character assassination तक सीमित हो जाती है।
राजनीतिक मंचों पर शालीन संवाद की जगह aggressive rhetoric ने ले ली है। नेता policy discussion से ज्यादा emotional polarization पर ध्यान देने लगे हैं। चुनावी भाषणों में विकास से ज्यादा विरोधियों के खिलाफ कटु टिप्पणियां सुनाई देती हैं।
इसका सीधा असर जनता पर पड़ता है। जब शीर्ष नेतृत्व अपमानजनक भाषा का उपयोग करता है, तो वही शैली समाज में भी सामान्य होने लगती है। लोग असहमति को बहस की तरह नहीं, बल्कि दुश्मनी की तरह देखने लगते हैं।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई समस्या
Social media ने political communication को पूरी तरह बदल दिया है। अब संदेशों की गुणवत्ता से ज्यादा उनकी viral capacity महत्वपूर्ण हो गई है। छोटे, तीखे और उत्तेजक statements ज्यादा तेजी से फैलते हैं, जबकि संतुलित और विचारशील बातें पीछे रह जाती हैं।
Twitter, Facebook, YouTube और WhatsApp जैसे platforms पर misinformation और half-truths बहुत तेजी से फैलते हैं। कई बार fake narratives इतने प्रभावशाली बन जाते हैं कि बाद में सत्य सामने आने पर भी लोग अपना विश्वास नहीं बदलते।
राजनीतिक दल भी इस psychology को समझते हैं और उसी अनुसार messaging तैयार करते हैं। इससे लोकतांत्रिक debate की गुणवत्ता और गिरती है।
मीडिया और राजनीति का खतरनाक गठजोड़
पत्रकारिता और राजनीति का यह संकट अलग-अलग नहीं है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। मीडिया राजनीतिक भाषा को amplify करता है, और राजनीतिक दल media platforms का उपयोग अपनी narrative building के लिए करते हैं।
जब media सवाल पूछने के बजाय केवल political statements को repeat करने लगे, तब journalism watchdog नहीं, loudspeaker बन जाती है।
दूसरी ओर, sensational political statements media के लिए ready-made content बन जाते हैं। इससे constructive governance issues जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और ग्रामीण विकास पीछे छूट जाते हैं, जबकि विवाद और drama headlines बन जाते हैं।
यह cycle दोनों को कमजोर करता है—politics को भी और journalism को भी।
समाधान क्या है?
इस स्थिति को बदलने के लिए collective responsibility जरूरी है।
सबसे पहले journalists को अपने professional ethics की ओर लौटना होगा। Fact-checking, fairness, accountability और public interest को फिर से journalism का केंद्र बनाना होगा। Media organizations को quantity नहीं, quality पर focus करना होगा।
दूसरी ओर, political leaders को शब्दों की ताकत समझनी होगी। भाषा केवल चुनाव जीतने का हथियार नहीं, समाज को जोड़ने का माध्यम भी है। जिम्मेदार नेतृत्व वही है जो disagreement को dignity के साथ संभाले।
Educational institutions को भी media literacy पर काम करना चाहिए। लोगों को यह सिखाना जरूरी है कि कौन-सी खबर credible है, कौन-सी misleading, और कैसे facts verify किए जाएं।
Citizens की भूमिका भी सबसे महत्वपूर्ण है। यदि जनता sensationalism को reward करना बंद कर दे और responsible journalism की demand करे, तो media को बदलना ही पड़ेगा।
निष्कर्ष
पत्रकारिता का पतन और राजनीति की बिगड़ती भाषा केवल पेशेगत समस्याएं नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को हिलाने वाली चुनौतियां हैं। जब सत्य कमजोर होता है, तब झूठ ताकतवर हो जाता है। जब शब्द घायल होते हैं, तब समाज का संवाद टूट जाता है।
हमें यह समझना होगा कि democracy केवल institutions से नहीं, trust से चलती है। और trust तभी बनता है जब पत्रकारिता ईमानदार हो और राजनीति गरिमामय।
आज आवश्यकता केवल सुधार की नहीं, बल्कि पुनर्जागरण की है—ऐसी पत्रकारिता का पुनर्जागरण जो सच के लिए खड़ी हो, और ऐसी राजनीति का पुनर्जागरण जो समाज को जोड़ने का काम करे।
यदि media, political leadership और citizens मिलकर यह जिम्मेदारी निभाएं, तभी लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य, शैक्षिक स्तंभकार, प्रख्यात शिक्षाविद्
मलोट, पंजाब









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