April 25, 2026 6:54 pm

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Chandigarh “Sukhna Path” के बोर्ड: स्मार्ट सिटी के सपनों से प्रशासनिक सच्चाई तक

जब साइनबोर्ड बन जाएं “मृत प्रतीक”—योजनाओं की अधूरी कहानी और जवाबदेही पर सवाल

आरके गर्ग सीनियर सिटीजन चंडीगढ़

चंडीगढ़, जिसे भारत के सबसे व्यवस्थित और योजनाबद्ध शहरों में गिना जाता है, आज एक अजीब विडंबना का सामना कर रहा है। “Sukhna Path” का बोर्ड और उसके नीचे लगा “Smart City Chandigarh” का लोगो अब केवल दिशा बताने का काम नहीं करते, बल्कि वे एक ऐसे अधूरे वादे की याद दिलाते हैं, जो कभी बड़े उत्साह के साथ किया गया था। ये बोर्ड आज एक प्रतीक बन चुके हैं—सपनों, योजनाओं और उनके अधूरे रह जाने की कहानी के।
वर्षों पहले जब चंडीगढ़ को Smart City के रूप में घोषित किया गया था, तब इसे आधुनिक शहरी विकास का एक मॉडल माना गया। उम्मीद थी कि शहर तकनीक, पारदर्शिता और नागरिक सुविधाओं के मामले में एक नई मिसाल कायम करेगा। लेकिन बीते समय के साथ यह उत्साह धीरे-धीरे कम होता गया। पिछले साल मार्च में Smart City प्रोजेक्ट औपचारिक रूप से बंद हो गया, और इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी अधूरा रह गया—जो योजनाएं शुरू हुई थीं, उनका क्या हुआ?

स्थिति आज यह है कि न केवल कई परियोजनाएं अधूरी रह गईं, बल्कि जो फंड बचा, उसके उपयोग को लेकर भी स्पष्टता का अभाव दिखाई देता है। आम नागरिक के दृष्टिकोण से देखें तो यह धारणा बनती है कि “बचे हुए पैसे भी इधर-उधर हो गए”, जबकि जमीन पर कोई ठोस परिणाम नजर नहीं आता। लेकिन जो चीज अब भी हर जगह दिखाई देती है, वे हैं—साइनबोर्ड।

शहर के हर कोने में लगे ये “Smart City Chandigarh” के बोर्ड अब मानो लोगों को चिढ़ाते नजर आते हैं। वे किसी उपलब्धि का प्रतीक नहीं, बल्कि असफलता की कहानी कह रहे हैं। राहगीरों को दिशा दिखाने के बजाय ये एक सवाल खड़ा करते हैं—

क्या यही था स्मार्ट सिटी का सपना?
चंडीगढ़ में एक और दिलचस्प, लेकिन चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिलती है—यहां एक बार कोई बोर्ड लग जाए, तो वह वर्षों तक वहीं बना रहता है, चाहे उसकी उपयोगिता खत्म हो चुकी हो। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक गहरी प्रणालीगत समस्या का संकेत है। सार्वजनिक स्थानों का प्रबंधन केवल निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें समय-समय पर समीक्षा और सुधार भी शामिल होना चाहिए।
यह समस्या केवल एक प्रोजेक्ट या कुछ साइनबोर्ड्स तक सीमित नहीं है। यह उस सोच को दर्शाती है, जिसमें योजना शुरू करना आसान होता है, उसे पूरा करना मुश्किल, और असफलता की जिम्मेदारी लेना लगभग नामुमकिन। जब योजनाएं अधूरी रह जाती हैं और उनके प्रतीक शहर में बने रहते हैं, तो वे प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं।
चंडीगढ़ जैसे सुव्यवस्थित शहर में इस तरह के “मृत प्रतीक” (dead symbols) वर्षों तक खड़े रहना न केवल सौंदर्य को प्रभावित करता है, बल्कि यह नागरिकों के विश्वास को भी कमजोर करता है। ये बोर्ड शहर की सूरत नहीं, उसकी कमज़ोरी दिखाते हैं। खासकर उन लोगों के लिए जो पहली बार शहर में आते हैं, यह एक भ्रमित करने वाला अनुभव हो सकता है—जहां दावे कुछ और हैं और वास्तविकता कुछ और।
सार्वजनिक धन के उपयोग का मुद्दा भी यहां महत्वपूर्ण हो जाता है। इन साइनबोर्ड्स को लगाने में जो खर्च हुआ, वह करदाताओं के पैसे से हुआ। जब उनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है, तो उनका बने रहना न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता का भी प्रतीक है।

अब सवाल उठता है—समाधान क्या है?
सबसे पहले, शहर में लगे सभी पुराने और अप्रासंगिक बोर्डों का नियमित ऑडिट किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि केवल वही साइनबोर्ड बने रहें, जो वर्तमान में उपयोगी और प्रासंगिक हैं। दूसरे, जैसे ही कोई प्रोजेक्ट समाप्त होता है—चाहे वह सफल हो या असफल—उससे जुड़े प्रतीकों को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।
तीसरा, परियोजनाओं के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि कोई योजना अधूरी रह जाती है या बंद हो जाती है, तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों से जवाब मांगा जाना चाहिए। यह न केवल पारदर्शिता बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोकने में भी मदद करेगा।
चौथा, नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देना भी जरूरी है। जब आम लोग इस तरह के मुद्दों को उठाते हैं, तो प्रशासन पर कार्रवाई करने का दबाव बनता है। एक जागरूक समाज ही बेहतर प्रशासन की नींव रखता है।
अंततः, यह समझना होगा कि एक स्मार्ट सिटी केवल डिजिटल तकनीक या आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं बनती। वह बनती है—जवाबदेही, पारदर्शिता और निरंतर सुधार की भावना से। “Sukhna Path” जैसे साइनबोर्ड, जो कभी एक उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा करते थे, आज एक अधूरी कहानी के गवाह बन चुके हैं।
यह केवल एक फोटो या एक बोर्ड का मुद्दा नहीं है—यह एक पूरे सिस्टम पर सवाल है। और जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक ये “मृत प्रतीक” शहर में खड़े रहकर हमें यही याद दिलाते रहेंगे कि योजनाएं आई थीं… लेकिन उनका अंजाम क्या हुआ, यह आज भी एक रहस्य है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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