डीजीपी अजय सिंघल बोले— तकनीक के प्रभावी उपयोग से सुनवाई में देरी घटी, न्यायिक प्रक्रिया हुई अधिक तेज, पारदर्शी और परिणामोन्मुखी
चंडीगढ़, 6 फरवरी। न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सुगम, तेज और प्रभावी बनाने की दिशा में जिला न्यायालयों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाहों के बयान दर्ज करने में उल्लेखनीय सफलता सामने आई है। 15 जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के दौरान इस तकनीक का व्यापक और सुनियोजित उपयोग करते हुए न्यायालयों ने पारंपरिक चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए एक नया मानक स्थापित किया है। इस अवधि में 89,136 गवाहों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संपन्न कराए गए। डॉक्टरों, फॉरेंसिक एवं अन्य विशेषज्ञों, पुलिस एवं जेल अधिकारियों तथा सामान्य गवाहों की उपस्थिति अब भौगोलिक दूरी, सुरक्षा व्यवस्था या समय की कमी से बाधित नहीं रही।
न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक से आया बड़ा सुधार: डीजीपी
हरियाणा के पुलिस महानिदेशक अजय सिंघल ने कहा कि जिला न्यायालयों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाहों के बयान न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी, समयबद्ध और परिणामोन्मुखी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक के उपयोग से गवाहों की अनुपलब्धता के कारण सुनवाई में होने वाली देरी में उल्लेखनीय कमी आई है और मामलों के निपटारे की गति तेज हुई है। डीजीपी ने कहा कि पुलिस, जेल प्रशासन तथा चिकित्सक और विशेषज्ञ गवाहों को बार-बार अदालत में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे समय, संसाधन और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाला बोझ भी कम हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि संवेदनशील मामलों में गवाहों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग एक भरोसेमंद माध्यम के रूप में सामने आई है।
डिजिटल न्याय प्रणाली से सुशासन, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत की ऐतिहासिक उपलब्धि
तीन नए आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन से प्राप्त प्रशासनिक, पर्यावरणीय और आर्थिक लाभों का आकलन करने हेतु एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा विस्तृत अध्ययन कराया गया, जिसके अत्यंत सकारात्मक परिणाम सामने आए। ई-चालान प्रणाली की शुरुआत से मात्र चार महीनों में लगभग 6,704 A4 रिम काग़ज़ की बचत हुई, जिससे 8,165 किलोग्राम CO₂ उत्सर्जन में कमी और 3,15,106 लीटर पानी का संरक्षण संभव हुआ। इसी प्रकार, ई-समन प्रणाली के माध्यम से लगभग 3,240 रिम काग़ज़ सुरक्षित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 1,52,306 लीटर पानी तथा 27,00,466 लीटर ईंधन की बचत हुई, जिसकी अनुमानित मौद्रिक कीमत ₹25.65 करोड़ है, यह उपलब्धि केवल छह महीनों की अवधि में हासिल की गई। वहीं, न्यायिक प्रक्रिया में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के व्यापक उपयोग से सात महीनों में लगभग 1,22,400 लीटर ईंधन की बचत हुई, जिसकी अनुमानित लागत ₹1.16 करोड़ है। इसके अतिरिक्त, पुलिस कर्मियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेशी सुनिश्चित किए जाने से यात्रा भत्ते के रूप में लगभग ₹1.10 करोड़ की अतिरिक्त बचत दर्ज की गई। ये आंकड़े न केवल प्रशासनिक दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाते हैं, बल्कि सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और जनधन के विवेकपूर्ण उपयोग की दिशा में एक सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
अदालतों की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाहों के बयान दर्ज होने से न केवल मामलों की सुनवाई में अनावश्यक विलम्ब कम हुआ है, बल्कि अदालतों की कार्यक्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पुलिस और जेल प्रशासन को बार-बार गवाहों को लाने-ले जाने की आवश्यकता नहीं रही, जिससे समय, मानव संसाधन और खर्च की बचत हुई। साथ ही संवेदनशील मामलों में गवाहों की सुरक्षा और सुविधा भी बेहतर रूप से सुनिश्चित की जा सकी।
तकनीक आधारित न्याय की सशक्त मिसाल
यह पहल न्याय व्यवस्था में तकनीक के सफल समावेश की एक सशक्त मिसाल है। डिजिटल माध्यमों के जरिए न्यायालयीन कार्यवाही की निरंतरता बनी रही और मामलों के शीघ्र निपटारे में सहायता मिली। यह सफलता कहानी दर्शाती है कि जब न्याय व्यवस्था आधुनिक तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है, तो न्याय न केवल तेज होता है, बल्कि अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुखी भी बनता है।











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