आर.के. गर्ग ने उठाए प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त अनौपचारिक शक्ति केंद्रों पर सवाल
बाबूगिरी हिंदी न्यूज़
चंडीगढ़। चंडीगढ़ नगर निगम के मेयर द्वारा हाल ही में एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान की गई टिप्पणी ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मेयर ने कहा था कि कई बार सरकारी कार्यालयों में “चपरासी भी उनसे अधिक शक्तिशाली प्रतीत होते हैं”। यह बयान भले ही असामान्य लगा हो, लेकिन इसने प्रशासनिक व्यवस्था के उस पक्ष को उजागर कर दिया है, जिस पर आम नागरिक लंबे समय से चर्चा करते रहे हैं।
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और जनहित मामलों के जानकार आर.के. गर्ग का कहना है कि मेयर की यह टिप्पणी किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढांचे में मौजूद उन खामियों की ओर संकेत है, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। उनका मानना है कि चंडीगढ़ जैसे सुनियोजित और आधुनिक शहर में नागरिकों की सबसे बड़ी अपेक्षा पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल प्रशासन की होती है, लेकिन कई सरकारी कार्यालयों में वास्तविक स्थिति इससे अलग दिखाई देती है।
वर्षों से एक ही स्थान पर तैनाती से बढ़ता प्रभाव
आर.के. गर्ग के अनुसार विभिन्न विभागों में क्लास-सी और क्लास-डी श्रेणी के कर्मचारी, विशेष रूप से आउटसोर्स आधार पर कार्यरत कर्मियों का एक वर्ग वर्षों तक एक ही कार्यालय या सीट पर तैनात रहता है। लंबे समय तक एक ही स्थान पर कार्य करने के कारण वे कार्यालय की प्रक्रियाओं, अधिकारियों और कार्यप्रणाली पर गहरी पकड़ बना लेते हैं। इससे कई बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जहां आम नागरिक को लगता है कि उसका काम अधिकारियों से अधिक इन कर्मचारियों की इच्छा पर निर्भर है।
उन्होंने कहा कि जनता के बीच अक्सर ऐसी शिकायतें सुनने को मिलती हैं कि कौन-सी फाइल पहले आगे बढ़ेगी, किसे अधिकारी तक पहुंच मिलेगी और किसका काम प्राथमिकता से होगा, इन मामलों में कुछ कर्मचारियों का अनौपचारिक प्रभाव दिखाई देता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी कर्मचारियों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता और बड़ी संख्या में कर्मचारी पूरी ईमानदारी, संवेदनशीलता और समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।
नागरिकों के अनुभवों ने बढ़ाई चिंता
गर्ग का कहना है कि जब किसी विभाग के संबंध में लगातार शिकायतें सामने आती हैं तो उस व्यवस्था की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है। कई नागरिकों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया है कि कुछ कार्यालयों में उन्हें सहयोगात्मक वातावरण नहीं मिलता। कई बार लोगों को अपमानजनक व्यवहार, अनावश्यक देरी और अनिश्चित प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियां सरकारी संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं और प्रशासन तथा नागरिकों के बीच दूरी बढ़ाती हैं।
जवाबदेही के दायरे में आएं सभी स्तर के कर्मचारी
आर.के. गर्ग ने सवाल उठाया कि यदि वरिष्ठ अधिकारियों, बाबुओं और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े नियम लागू हैं, तो लंबे समय तक एक ही सीट पर कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी समान सिद्धांत लागू होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की संवेदनशील पदों पर रोटेशन और स्थानांतरण की भावना केवल उच्च पदों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिन कर्मचारियों का प्रत्यक्ष संपर्क आम जनता से होता है और जहां अनौपचारिक शक्ति केंद्र बनने की संभावना रहती है, वहां समय-समय पर स्थानांतरण और कार्य परिवर्तन की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
सुधार का अवसर बने यह बहस
गर्ग का सुझाव है कि प्रशासन इस मुद्दे को किसी विवाद या व्यक्तिगत टिप्पणी के रूप में न देखकर सुधार के अवसर के रूप में ले। उन्होंने आउटसोर्स और अन्य कर्मचारियों के लिए निश्चित कार्यकाल तय करने, समयबद्ध स्थानांतरण नीति लागू करने, व्यवहार संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने और शिकायतों की निष्पक्ष जांच की व्यवस्था विकसित करने की मांग की।
इसके साथ ही उन्होंने डिजिटल शिकायत निवारण प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया ताकि नागरिक बिना किसी दबाव या भय के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें और उनकी सुनवाई सुनिश्चित हो सके।
‘सेवा भावना’ हो वास्तविक शक्ति का आधार
आर.के. गर्ग का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक प्रशासनिक व्यवस्था में वास्तविक शक्ति पद या प्रभाव से नहीं, बल्कि सेवा भावना और जनता के प्रति जवाबदेही से आनी चाहिए। यदि आम नागरिक किसी सरकारी कार्यालय में सम्मान, सहयोग और पारदर्शिता का अनुभव करता है, तभी प्रशासन की सफलता मानी जा सकती है।
उन्होंने कहा कि मेयर की टिप्पणी से कुछ लोग सहमत हों या असहमत, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बयान ने प्रशासनिक व्यवस्था की एक ऐसी “दुखती रग” को सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया है, जिस पर लंबे समय से खुलकर बात नहीं हो रही थी। अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन आत्ममंथन करते हुए ऐसे सुधारात्मक कदम उठाए, जो जनता के विश्वास को और मजबूत करें।













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