हम ने हर जख्म जमाने से छुपा कर रखा
एक तस्वीर की मानिंद सजा कर रखा
लोग पढते रहे चेहरे को किताबों की तरह
हम ने हर पन्ना मगर खुद से बचा कर रखा
आप चाहे कितने ही धनाढय बन जाएं,चाहे कितने ही ताकतवर बन जाएं, लेकिन जीवन में सबसे ज्यादा लुत्फ आपको कब आएगा? चाहे आप दुनिया की सबसे महंगे मकान में रह लें, चाहें आप दुनिया का हर ऐशो आराम, हर सुख साधन भोग लें,लेकिन ये सब आपको क्षणिक सुख ही प्रदान करेंगे। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि सबसे ज्यादा खुशी होती है अंदर की खुशी। जब आप अंदर से खुश होते हैं तो आपको खुश होने के लिए बाहरी साधनों-संसाधनों का मोहताज नहीं होना पड़ता। उन पर आश्रित नहीं होना पड़ता। वो अंदर की खुशी देने वाला एक बहुत बड़ा तत्व है ज्वाय आफ गीविंग। किसी रोते हुए बच्चे को हंसाना। किसी जख्मी निरीह पशु के जख्म पर दवा लगाना। किसी गिरे हुए को उठाना। किसी भूखे को भोजन कराना। किसी निराश्रित का सहारा बनना। किसी बेरोजगार को रोजगार देना। किसी अनपढ को शिक्षित करना। ऐसे काम आपको जो खुशियां देते हैं उसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ये अलग ही आंनद की अनुभूति होती है। अभी पिछले दिनों गुरूग्राम में एक संस्था ने यूपीएससी परीक्षा में सफल हुए उम्मीदवारों के सम्मान में एक कार्यक्रम किया। ग्रामीण युवा केंद्र नामक एक संस्था कृषक समाज के गरीब, लेकिन प्रतिभाशाली बच्चों को यूपीएससी व अन्य ऐसी ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवा रही है।
इस संस्था को रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी करनैल सिंह की प्रमुखा भूमिका है। वही करनैल सिंह जो 1984 बैच के रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और मोदी सरकार में लंबे समय तक इंनफोरसमेंट डायरेक्टरेट-ईडी के मुखिया रहे। इस संस्था को रिएल एस्टेट से जुडे दो प्रमुख ग्रुप भी वित्तीय सहायता मुहैया करवाते हैं। इस संस्था ने दिल्ली के राजेंद्र नगर में हास्टल बना रखे हैं, जहां इन प्रतिभाशाली युवाओं का मार्गदर्शन किया जाता है। उनको अफसर बनने के लिए हर तरह की सहायता उपलब्ध करवाई जाती है। छोटी सी कोशिशों से शुरू हुआ ये सफर अब धीरे धीरे कारवां और काफिले में परविर्तित होने लगा है। इस संस्था से जुड़े करीब तीन दर्जन बच्चों ने यूपीएससी की आईएएस व ऐसी ही परीक्षाओं मे हाल ही में कामयाबी के झंड़े गाड़ दिए हैं। इस सारे कार्यक्रम के आयोजक एक मित्र के आग्रह पर मुझे यहां गुरूग्राम में उपस्थित होना पड़ा। हालांकि इस तरह के बुलावे काफी स्थानों से मुझे आते रहते हैं,लेकिन इनमें जाना मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं है। इसी तरह पत्रकारों को सम्मानित करने-होने और लैक्चर देने के नाम पर भी देश भर से आमंत्रण आते रहते हैं,लेकिन उनमें अभी तक शिरकत करने से गुरेज ही किया। इस ग्रुरूग्राम के आयोजन में भी मैं इसी शर्त पर आने को तैयार हुआ कि मैं वहां कोई लैक्चरबाजी नहीं दूंगा। मेरा मानना है-ये मेरा दृढ विश्वास है कि ये सभी सफल प्रतियोगी मुझ से ज्यादा जानते हैं और उनको किसी सलाह मशवरे की अब जरूरत नहीं है। बहराल इस आयोजन में शामिल होकर मुझे अपार प्रसन्नता हुई और ये जानने समझने का अवसर मिला कि हमारे देश में,हमारे प्रदेश में, हमारे समाज में बहुत सी ऐसी संस्थाएं और लोग हैं जो बिना कोई श्रेय की अपेक्षा किए नींव की र्इंट की तरह काम कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में कुछ आईएएस व आईपीएस व रिटायर्ड अधिकारी भी पहुंचे हुए थे। आईएएस व अन्स सहायक परीक्षाओं में सफल हुए युवाओं को इस कार्यक्रम में सबसे जरूरी सलाह करनैल सिंह ने दी। उन्होंने कहा कि- ए मैन इज नोन बाय इटस कंपनी। आप लोग किस के साथ उठते बैठते हो इसका जरूर ध्यान रखना। किसी गलत आदमी की सोहबत से हमेशा खुद को दूर रखना। करनैल सिहं के लिए कहा जा सकता है..
हमने सूरज की रोशनी में कभी अदब नहीं खोया
कुछ लोग जुगनुओं की चमक में मगरूर हो गए
… हमला अचानक से हो गया
इस कार्यक्रम के बाद डिनर का आयोजन था। मेरे आयोजक मित्र ने मेरे लिए कुछ अलग ही सोच रक्खा। अलग ही प्लान बनाई हुई थी। उन्होंने बाहर लान में ढेर सारे प्रतिभागी इकटठा कर लिए। मुझे वहां ले जा कर उन से मेरा परिचय करवाया और मुझे उनको कुछ टिप्स देने-अपना अनुभव बांटने के लिए कह दिया। अब जाहिर है कि अचानक हुए इस हमले के लिए मैं तनिक भी तैयार न था। वहां से मेरा बच कर निकलना नामुमकिन था। सो अपने तीन दशक से ज्यादा के तर्जुेबे के आधार पर मैंने भी वहां दो फरड़े फेंक दिए और उनको यही कहा.. आपने ये सुना होगा कि पैसा खुद तो नहीं,लेकिन खुदा की कसम, ये खुदा से कम भी नहीं। तो मैं तो आप सभी सफल प्रतिभागियों को यहीं कहना चाहंूगा कि अपने देश में आईएएस-आईपीएस होना खुद तो नहीं,लेकिन खुदा होने से कम भी नहीं। आप बस किसी आदमी को ही औरत नहीं बना सकते, बाकि हर काम करने की हैसियत रखते हो। अभी आप में से कुछ को देख कर लगता है कि आपको दुनियादारी का ज्यादा सा ज्ञान नहीं है। लेकिन जल्द ही आप का पावर से सामना होगा। खुद को सर्वशक्तिमान होने का अहसास होगा। तब जल्द ही आप के पर निकल आएंगे। आप लोग चलते फिरते मंदिर-मस्चिद, औषधालय-चिक्त्सिालय बन जाएंगे। एक तरह से आप लोगों की तकलीफ दूर करने वाले डाक्टर बन जाएंगे। खुद का आचरण पारस की तरह रखें। एक दुखिया आप से मिले और झट से आप उनके कष्टों का हरण कर लें। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने मंसूरी की आईएएस अकादमी में अपने एक लैक्चर में कभी कहा था कि अगर आप किसी पीड़ित का दुख सुन भर लेते हो तो उसकी आधी पीड़ा खत्म हो जाती है। ऐसे में आपको अपना नजरिया और रवैया राजा की बजाय एक सेवक का रखना है। जितना लोगों के करीब होंगे-जितना उनकी सुनेंगे, उतना ही आपको न केवल सीखने को मिलेगा, बल्कि आप को पुण्य की प्राप्ति भी होगी। फिर धीरे धीरे वो अवस्थ भी आ जाएगी कि आप किसी को देखते ही उसकी पीड़ा का अंदाजा लगा सकोगे। लोगों के कष्टों का हरण करने में जो खुशी मिलती है वो अतुल्नीय है। इस जैसा नशा दुनिया में दूसरा नहीं है। ऐसे माहौल पर कहा जा सकता है..
कितना कुछ जानता होगा वो शख्स मेरे बारे में
जिसने मुझे हंसते हुए देख कर पूछा उदास क्यों हो
सोशल मीडिया का उचित इस्तेमाल
अब आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस-एआई का जमाना है। सोशल मीडिया का जमाना है। हर आदमी के हाथ में मोबाइल फोन है। न जाने किसी भेस में आप नारायण मिल जाए। ऐसे में हरदम सावधान रहिए। पता नहीं कौन, आपकी कैसी रिकार्डिंग कर सोशल मीडिया पर डाल दे। आप की सारी मेहतन पर पानी फेर दी। आपको सोशल मीडिया का अत्यंत होशियारी से इस्तेमाल करना है। ये खुद के महिमामंडन के लिए नहीं होना चाहिए। ये न हो कि आपको पहली पोस्टिंग मिली है और आप गाड़ी गनमैन के साथ फेसबुक-इंस्टाग्राम पर फोटो अपलोड करते हुए लोगों को ये दिखाने की कुचेष्टा कर रहे हो कि आप बहुत बड़ी तोप बन गए हो। इस से ये संदेश जाएगा-तुम्हारा लहजा बता रहा है तुम्हारी दौलत नई नई है। ऐसे में सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों के कल्याण के लिए करें। सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार के लिए करें। आप ने अगर कोई नई प्रशासनिक पहल की है तो उसकी जानकारी देने के लिए करें। खुद के प्रचार प्रसार से बचें।
संकट मोचक बनें
जहां भी-जिस पद पर आप रहें,वहां ट्रबल शूटर बनें। एक संकट मोचक बनें। यंू तो हर बरस करीब एक हजार युवा यूपीएससी के आईएएस व अलाइड सेवाओं में भर्ती होते हैं। इनको कौन याद रखता है? रखें भी क्यों? क्योंकि इनमें से अधिकतर कुछ खास करते भी नहीं। यही तो करते हैं कि फाइल नीचे भेज दी-फाइल ऊपर भेज दी। बहुत से तो सिर्फ क्लर्क की तरह ही नौकरी करते हैं। आप को ऐसा नहीं करना है। आपको अपने काम से पहचान बनानी है। ऐसा सा मानिए कि आपको एक स्थान पर औसतन करीब दो बरस के लिए काम करने का मौका मिलेगा। आप की पोस्टिंग की अवधि हालात के मुताबिक कम ज्यादा हो सकती है। ऐसे में ये उचित होगा कि आप वही प्रौजेक्ट हाथ में लें जो आप अपनी पास्ंिटंग के दौरान सिरे चढा सको। आप अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली दो पुरानी बड़ी समस्यों का निराकरण करें और दो नए काम जरूर करें। कोशिश करें कि कुछ नया करें,बड़ा करें,अनूठा करें। इसी से आपकी पहचान बनेगी। कुछ ऐसा सा नाम कमाएं कि जहां आप खड़े हो गए लाइन वहीं से शुरू होगी। मिसाल के तौर पर द ग्रेट एस.के.मिश्रा जी। 1956 बैच के आईएएस अधिकारी एस.के.मिश्रा हरियाणा के तीन मुख्यमंत्रियों बंसीलाल, भजनलाल और देवीलाल के पीएससीएम रहे। चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने तो वो उनके भी प्रधान सचिव रहे। मिश्रा जी जिस भी पोस्ट पर रहे उसी को इज्जत बख्शी। जब उनको हरियाणा टूरिज्म का दायित्व मिला तो इसका बजट था महज तीन लाख रूपए जो इन्होें आते ही करवा दिया तीन करोड़ रूपए। कुछ ऐसे पद भी थे जिनको अफसरशाही में खुडडेलाइन माना जाता था। जैसे ही मिश्रा जी को इन पदों पर बैठने का अवसर मिला उन्होंने अपने ज्ञान,विवेक और अनुभव से इनको वो बुलंदी बख्शी कि उनके जाने के बाद अफसरों में उन पदों पर लगने की खूब मारामारी रही। ये सब आप तभी कर पाएंगे जब आपको ज्ञान होगा और आप में कुछ करने का जज्बा होगा। पढने की आदत जरूर डालें। अधीनस्थों पर कतई आश्रित ना रहें। आप की छवि ऐसी ना हो कि अधीनस्थ आप से किसी भी फाइल पर कभी भी दस्तख करवा लेंगे। सीखने को आतुर रहें।
फील्ड विजिट जरूर करें
आप एसी कमरों में बैठ कर शासन प्रशासन ना चलाएं। ये नियम बना लें कि एक सप्ताह में कम से कम एक दिन फील्ड विजिट जरूर करें। जितना आप फील्ड में जाओगे, उतना ही सीखने को मिलेगा। विकास परियोजनाओं का मौके पर जा कर जायजा लें। जनसाधारण से मिलें। कभी कभी सप्राइज विजिट जरूर करें।
पब्लिक को इंतजार ना करवाएं
जहां तक हो सके जनसाधारण को मिलने के लिए इंतजार ना करवाएं। अपने आफिस की मीटिंग का शिडयूल आमतौर पर दोपहर के बाद रखें। आफिस का शुरूआती समय जनता जनार्दन के लिए रखें। उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रौएक्टिव रहें। पीड़ित पक्ष के काम के लिए जिस सबंधित अधिकारी-कर्मचारी को जो कहना है, पब्लिक के सामने कहें। अपने पर्सनल स्टाफ पर ऐसे मसले मत छोड़ें। सामने वाले को संतुष्ट करने की कोशिश करें। पब्लिक के कामों को टालने से गुरेज करे। जब आप लोगों के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे तो यही लोग आप के ब्रांड एम्बसैडर बन जाएंगे। यही आपकी पब्लिसिटी कर देंगे। इस काम के लिए आप को सोशल मीडिया पर ऊर्जा लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
प्रैक्टिल हो सोच
किताबी ज्ञान अपनी जगह और व्यवहारिक ज्ञान अपनी जगह। इनमें संतुलन जरूर होना चाहिए। ये संतुलन तब पैदा होगा जब आप को ये ज्ञान होगा कि फील्ड पर काम कैसे होता है। कैसी कैसी अड़चनें आती हैं। कैसे उनका समाधान होता है। किसी भी समस्या के समाधान का सबसे बेहतर ज्ञान पीड़ित पक्ष को होता है। किसी भी नीति निर्माण का विषय हो तो प्रभावित पक्ष-स्टेक होल्डर की जरूर सुनें।
अपनी बात जरूर कहें
सरकारी नौकरी में बहुत दफा किस्म किस्म के दबावों का सामना करना पड़ता है। कई दफा अनुचित कामों के लिए भी दबाव होता है।ऐसे में अपना पक्ष जरूर कहें। फाइल पर भी और अगर संभव हो तो मौखिक तौर पर भी उच्चाधिकारी-मंत्री-सीएम को जरूर अपनी बात करें। बात विनम्रता से कहें। अकड़े मत। जैसा कि कहा भी जाता है कि..
कौन सी बात, कहां, कैसे, कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है
पैर जमीन पर टिकाए रखें
आप लोगों के लिए अभी तो पार्टी शुरू हुई है। अभी तो आप लोगों को बहुत आगे और आगे जाना है। इसलिए मेरा यही कहना है कि आप लोग हमेशा पैर जमीन पर रख कर चलें। ग्राउडेंड रहें और रखें। जैसा कि सुप्रसिद्ध अंग्रेजी कवि रोबर्ट फोरेस्ट ने कहा था-माइल्ज टू गो बिफोर आई स्लीप। जाने अंजाने में कोई भी ऐसा काम नहीं करना जिस से आप की प्रतिष्ठा धूमिल हो। आप जहां भी जाएंगे वहां आपके जाने से पहले आप का नाम और प्रतिष्ठा पहुंचेंगी। इसलिए सदा सतर्क रहें।
किसी को छोटा ना समझें
ये नजरिया छोड़ दीजिए कि जो किसी वजह से अभी कामयाब नहीं हो पाया वो बेवकूफ है या कम अक्ल वाला है। अगर कोई किसी प्रतियोगी परीक्षा में एक नंबर से सफल होने से रह गया तो वो उम्मीदवार सफल हुए उम्मीदवारों से कम थोड़े ही है। ऐसे में सदा ही ईश्वर का शुक्र गुजार रहें कि उन्होंने इस अदभुत यात्रा के लिए आपको छांटा। आप की मेहनत के साथ साथ किस्मत का भी सफलता में योगदान रहता है। मेहनत बहुत लोग करते है।ं काबिल बहुत लोग होते हैं। मंजिल पर पहुंचने में किस्मत का भी रोल रहता है। इसलिए खुद के बारे में गलतफहमी ना पालें।
सलाह जरूर लें
अच्छी सलाह पता नहीं,कहां से, कब मिल जाए। इसे जरूर अपनाएं। किसी को भी कम ना समझे। एक छोटे पद पर कार्यरत व्यक्ति भी बहुत बड़ी जटिल समस्या को सुलझा सकता है। मसलन-स्टार क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर एल्बो गार्ड की समस्या से जूझ रहे थे। इस कारण एक समय उन से रन भी नहीं बन रहे थे। किस्म किस्म का इलाज करवाया,लेकिन बात नहीं बनी। एक दफा वर्ष 2001 में सचिन तेंदुलकर चैन्नई के होटल ताज कोरोमंडल में रूके थे। वहां एक सिक्योरिटी गार्ड एस.गुरूप्रसाद ने सचिन का आटोग्राफ लिया और कहा कि क्या मैं आप से क्रिकेट के बारे में कुछ बात कर सकता हंू? सचिन ने कहा-बिल्कुल। गुरूप्रसाद ने कहा कि मैं आपका बहुत बड़ा फैन हंू। मैं आप की बैटिंग को ध्यान से देखता हंू। आप जो एल्बो गार्ड पहनते हैं, उस से आपके बल्ले का स्विंग थोड़ा बदल जाता है। इसलिए आप जल्दी आउट हो जाते हैं। गुरूप्रसाद की सलाह पर सचिन ने एल्बो गार्ड को नए सिरे से डिजाइन करवाया और इस समस्या का समाधान पाया। ऐसे में अच्छी सलाह सुनने और इसे अपनाने के लिए हमेशा खुल्ला दिल रखें।
पत्रकारों से पंगा ना लें
कई दफा पंजाब के सीएम रहे प्रकाश सिंह बादल से नए नवेले आईएएस अफसरों का समूह शिष्टाचार भेंट करने गया। उन्होंने बादल साहब से राजकाज के टिप्स मांगे। बादल साहब ने उनको एक ही बात कही-आप कभी इन अखबार वालों से-इन पत्रकारों से पंगा ना लें। बादल साहब की सलाह में मैं अपनी तरफ से ये जोड़ना चाहंूगा कि जीवन में पंगा तो किसी से भी ना लें। नेताओं से तो कतई पंगा ना लें। नुकसान उठाओगे। उनको अपने साथ लेकर चलें। उनको भरपूर मान सम्मान दें। आप अफसर हैं तो इसका ये मतलब हरगिज नहीं कि आप को किसी की बेइज्जती करने का लाईसैंस मिल गया है। हम सब के पास एक दिन में 24 आवर ही हैं। ये हम पर निर्भर है कि हम इस समय को कैसे गुजारते हैं। ऐसे में किसी से लड़ने झगड़ने में कतई अपना समय और ऊर्जा मत लगाएं।
मददगार बनें
आप को तो ईश्वर ने आप की मंजिल पर पहुंचा दिया है। आप के बहुत से यार दोस्त,रिश्तेदार, भाई बहन और अन्य दूसरे लोग आप जितने किस्मत वाले नहीं रहे। उनको उनका मुकाम नहीं हासिल हुआ। ऐसे में अब आपका फर्ज ये भी बनता है कि आप दूसरे लोगों को प्रेरणा दें। उनके मददगार बनें। उनको आगे बढने में सहयोग दें। हर तरीके से मदद करें।
काम की बात
मेरी इस लैक्चरबाजी के आखिर चरण तक मेरे आयोजक मित्र पूरे मूढ में-पूरे जोश में आ चुके थे। उन्होंने भी कहा कि एक मेरी भी सुन लो- वो ये है कि अब आप लोग बड़े अफसर बन गए हो। जाहिर है कि शादी भी बड़ी जगह होंगी। मेरी तो एक बात मान लो- शादी के बाद पत्नी के सामने सरेंडर ना करें। बीवी की इज्जत जरूर करें। उनकी राय जरूर लें। उनकी राय मानें भी। लेकिन ये ना हो कि आप का हर फैसला आप की बीवी ही करे। कुछ कुछ मर्द भी रहें। एकदम आत्मसमर्पण ना करें।














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