April 5, 2026 2:03 pm

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चंडीगढ़ नगर निगम: समस्याओं का अंबार और चार मेयरों की नाकाम नेतृत्व-श्रृंखला— आर. के. गर्ग

आर. के. गर्ग आरटीआई एक्टिविस्ट, चंडीगढ़

चंडीगढ़। चंडीगढ़ नगर निगम आज केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं रह गया है, बल्कि यह अव्यवस्था, राजनीतिक टकराव और नेतृत्व की विफलता का प्रतीक बन चुका है। पिछले चार वर्षों में शहर को चार मेयर मिले, लेकिन दुर्भाग्यवश किसी का भी कार्यकाल चंडीगढ़ की बुनियादी समस्याओं का स्थायी समाधान देने में सफल नहीं रहा। नतीजतन, समस्याएँ जस की तस बनी रहीं और आम जनता का भरोसा लगातार टूटता चला गया।

सफाई व्यवस्था: ‘सिटी ब्यूटीफुल’ की पहचान पर दाग

नगर निगम की सबसे गंभीर समस्या सफाई व्यवस्था है। जिस चंडीगढ़ को कभी “सिटी ब्यूटीफुल” कहा जाता था, वहीं आज कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

गार्बेज प्रोसेसिंग प्लांट्स की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं, डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन अनियमित है और कई सेक्टरों में खुले में कचरा आम दृश्य बन गया है। हैरानी की बात यह है कि न तो कोई दीर्घकालिक नीति बनाई गई और न ही ज़मीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी दिखाई दी।

 

बरसात आते ही डूब जाता है शहर

हर मानसून में जलभराव और ड्रेनेज की समस्या नगर निगम की कार्यशैली की पोल खोल देती है।

करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नालों की समय पर सफाई नहीं होती, नतीजतन हल्की बारिश में ही सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं। यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सीधी-सीधी प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है।

 

सड़कें और पार्किंग: अस्थायी पैचवर्क, स्थायी परेशानी

सड़कों की हालत लगातार बिगड़ती चली गई। पैचवर्क को ही स्थायी समाधान मान लिया गया, जिससे समस्या और गहराती गई।

वहीं, पार्किंग नीति वर्षों से चर्चा और बैठकों तक सीमित रही। ठोस क्रियान्वयन न होने का खामियाजा रोज़ आम नागरिकों और व्यापारियों को भुगतना पड़ रहा है।

 

वित्तीय कुप्रबंधन ने बढ़ाई मुश्किलें

नगर निगम की एक बड़ी कमजोरी वित्तीय कुप्रबंधन भी रहा।

राजस्व बढ़ाने के लिए कोई ठोस और दूरदर्शी प्रयास नहीं किए गए। संपत्ति कर और अन्य शुल्कों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही, जबकि खर्चों में पारदर्शिता का स्पष्ट अभाव दिखा। इसका परिणाम यह हुआ कि निगम लगातार आर्थिक दबाव में फँसता चला गया।

 

चार मेयर, एक जैसी नाकामी

पिछले चार मेयरों के कार्यकाल पर नज़र डालें तो एक ही पैटर्न सामने आता है—राजनीति हावी, प्रशासन गौण।

पहले मेयर के कार्यकाल में नगर निगम राजनीतिक खींचतान का अखाड़ा बना रहा। विकास योजनाओं की बजाय समय सदन के विवादों और शक्ति प्रदर्शन में जाया हुआ।

दूसरे मेयर से उम्मीद जगी, लेकिन अनुभव की कमी और प्रशासन पर कमजोर पकड़ के चलते ज़मीनी बदलाव नहीं दिखा। योजनाएँ बनीं, पर फाइलों से बाहर नहीं निकल सकीं।

तीसरे मेयर का कार्यकाल घोषणाओं और प्रेस बयानों तक सिमट कर रह गया। स्मार्ट सिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार के दावे किए गए, लेकिन अधूरी परियोजनाओं और बढ़ती शिकायतों ने हकीकत उजागर कर दी।

चौथे मेयर के समय हालात और बिगड़ गए। राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आया, सदन बार-बार बाधित हुआ और नगर निगम लगभग ठप हो गया। इस दौर में जनता के मुद्दे पूरी तरह हाशिए पर चले गए।

 

जनता नाराज़, भरोसा टूटा

आज स्थिति यह है कि चंडीगढ़ का आम नागरिक नगर निगम से बेहद नाराज़ है।

शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन समाधान की रफ्तार बेहद धीमी है। चार वर्षों में चार मेयर बदलना यह साफ दर्शाता है कि नेतृत्व में निरंतरता का अभाव रहा, जिसका सीधा नुकसान शहर को उठाना पड़ा।

 

अब निर्णायक नेतृत्व की ज़रूरत

नए मेयर के सामने चुनौती सिर्फ समस्याओं को गिनाने की नहीं, बल्कि पिछली विफलताओं से सबक लेकर ठोस, समयबद्ध और जवाबदेह कार्ययोजना लागू करने की है।

चंडीगढ़ को अब प्रतीकात्मक नेतृत्व नहीं, बल्कि निर्णायक, पारदर्शी और जवाबदेह मेयर की सख्त ज़रूरत है।

अगर यह अवसर भी गंवाया गया, तो नगर निगम की गिरती साख को संभालना और कठिन हो जाएगा—और यह दौर चंडीगढ़ नगर निगम के इतिहास की सबसे कमजोर कड़ी के रूप में दर्ज हो जाएगा।

— आर. के. गर्ग

आरटीआई एक्टिविस्ट, चंडीगढ़

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Author: BabuGiri Hindi

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