मोमबत्तियाँ बुझ चुकी हैं, अहंकार अब भी जल रहा है।
-डॉ० प्रियंका सौरभ
कभी जन्मदिन बच्चों का हुआ करता था। एक टॉफी, एक मोमबत्ती और माँ की फुसफुसाहट—“धीरे से फूँक मारना।” अब जन्मदिन नेताओं का होता है और फूँक इतनी ज़ोर की होती है कि सरकारी खज़ाना, प्रशासन और मीडिया तीनों उड़ने लगते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले बच्चे बड़े होने की खुशी मनाते थे, अब बुज़ुर्ग यह साबित करने का उत्सव मनाते हैं कि वे अब भी हटाए नहीं जा सकते।
आज राजनीति में जन्मदिन किसी इंसान के पैदा होने की तारीख़ नहीं, बल्कि सत्ता के जीवित रहने का प्रमाणपत्र है। जैसे ही कैलेंडर में वह तारीख़ आती है, शहर की दीवारें अचानक बोलने लगती हैं, अख़बार मुस्कराने लगते हैं और सोशल मीडिया भक्ति में डूब जाता है। लगता है जैसे देश का सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि एक और साल बीत गया, लेकिन कुर्सी अब भी सुरक्षित है।
सुबह-सुबह सरकारी बधाइयों की कतार लगती है। अधिकारी ट्वीट करते हैं, मंत्री भावुक होते हैं और पार्टी प्रवक्ता ऐसे बयान देते हैं मानो राष्ट्र का पुनर्जन्म हुआ हो। कोई यह नहीं पूछता कि उसी सुबह किसी ट्रेन में भीड़ से लोग मर गए, किसी पुल की मरम्मत अधूरी रह गई या किसी अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिला। जन्मदिन वाले दिन ये सवाल असभ्य माने जाते हैं।
नेताओं के जन्मदिन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनकी उम्र बढ़ती ही नहीं। पैंसठ साल का व्यक्ति “युवा सोच” का प्रतीक बन जाता है। सत्तर साल का “अनुभव का महासागर” कहलाता है और अस्सी के आसपास पहुँचकर भी “देश की मजबूरी” घोषित कर दिया जाता है। जिस उम्र में आम आदमी पेंशन के लिए लाइन में खड़ा होता है, उस उम्र में नेता अगले पाँच साल का रोडमैप पेश करता है—वह भी बिना यह बताए कि पिछला रोडमैप कहाँ गड्ढे में गिरा।
जन्मदिन के नाम पर होने वाले आयोजन अब इतने भव्य हो गए हैं कि शादी-ब्याह भी शर्मिंदा हो जाएँ। कहीं हज़ार किलो का केक काटा जा रहा है, कहीं रिकॉर्ड बनाने के लिए सौ फुट लंबी माला पहनाई जा रही है। मंच पर वही नेता बैठा है जिसने पिछले भाषण में सादगी की मिसाल दी थी और नीचे वही भीड़ खड़ी है जिसे बताया गया था कि देश आर्थिक अनुशासन के दौर से गुजर रहा है।
समसामयिक राजनीति में जन्मदिन अब विकास का विकल्प बन चुका है। जहाँ सड़क नहीं बन पाती, वहाँ होर्डिंग लग जाती है। जहाँ स्कूल नहीं खुलते, वहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम हो जाते हैं। जहाँ अस्पतालों में बेड नहीं मिलते, वहाँ जन्मदिन पर रक्तदान शिविर की फोटो जारी कर दी जाती है—ताकि कमी भी उपलब्धि लगने लगे।
सबसे करुण दृश्य अफ़सरशाही का होता है। जन्मदिन पर उनकी मुस्कान उतनी ही बनावटी होती है जितनी किसी ट्रांसफर ऑर्डर के बाद दी गई विदाई। फूलों की माला पहनाते समय हाथ काँपते हैं, क्योंकि उन्हें पता है—अगर उत्साह कम दिखा, तो फाइलें बोलने लगेंगी। जन्मदिन अब खुशी नहीं, प्रशासनिक अनिवार्यता है।
सोशल मीडिया ने इस उत्सव को और लोकतांत्रिक बना दिया है—मतलब हर कोई चापलूस बन सकता है। कोई पुरानी फोटो डालकर लिखता है “आपके साथ संघर्ष के दिन,” जबकि संघर्ष असल में सिर्फ़ फोटो खिंचवाने तक सीमित रहा होता है। कोई कविता लिखता है जिसमें नेता को सूर्य, चंद्रमा और संविधान तीनों घोषित कर दिया जाता है। यह वही समाज है जहाँ बेरोज़गारी पर दो पंक्तियाँ लिखने से पहले लोग डरते हैं, लेकिन जन्मदिन की बधाई में शब्द खत्म नहीं होते।
जन्मदिन के दिन अचानक यह भी याद आ जाता है कि नेता बहुत संवेदनशील है। किसी अस्पताल का दौरा, किसी अनाथालय में बच्चों के सिर पर हाथ, किसी वृद्धाश्रम में चाय—और कैमरा हर कोण से मौजूद। अगले दिन वही अस्पताल फिर अपनी बदहाली में लौट जाता है, अनाथालय फिर अपने हाल पर और वृद्धाश्रम फिर सरकारी फाइल में गुम हो जाता है। संवेदनशीलता सिर्फ़ जन्मदिन तक सीमित रहती है।
राजनीति का यह भी एक विचित्र नियम है कि जन्मदिन के दिन आलोचना देशद्रोह मानी जाती है। अगर कोई पूछ ले कि इतने भव्य आयोजन की ज़रूरत क्या थी, तो उसे विकास विरोधी करार दे दिया जाता है। अगर कोई खर्च का हिसाब माँग ले, तो उसे विपक्षी मानसिकता का बताया जाता है। सवाल पूछना अब उम्र की तरह सीमित कर दिया गया है।
विडंबना यह है कि जिस देश में हर साल युवा नौकरी के लिए भटकते हैं, उसी देश में सत्ता पर वही चेहरे दशकों से जन्मदिन मना रहे हैं। मंच पर खड़े होकर वे युवाओं से धैर्य रखने की अपील करते हैं, जबकि खुद कुर्सी छोड़ने का धैर्य नहीं दिखा पाते। यह राजनीति का वह बुढ़ापा है जो अनुभव नहीं, जिद पैदा करता है।
जन्मदिन का उत्सव यह भी जाँचने का तरीका बन गया है कि भीड़ अब भी नियंत्रित है या नहीं। कितने लोग आए, कितनी बसें लगीं, कितने नारे लगे—यह सब लोकतंत्र का नया सर्वे है। अगर भीड़ कम हो जाए, तो अगले दिन संगठन में फेरबदल शुरू हो जाता है। जनता अब नागरिक नहीं, उपस्थिति रजिस्टर बन चुकी है।
बच्चों ने तो जन्मदिन को कब का साधारण बना लिया है। उन्हें पता है कि एक दिन बड़ा केक मिलने से ज़िंदगी नहीं बदलती। लेकिन नेता अब भी उसी बचपने में अटके हैं—बस खिलौने बदल गए हैं। अब खिलौना सत्ता है, तालियाँ हैं और कैमरे हैं। फर्क बस इतना है कि खिलौना टूटे तो देश टूटता है।
जन्मदिन अगर आत्ममंथन का दिन होता, तो शायद नेता यह पूछता कि पिछले साल कितने वादे पूरे हुए। कितनी योजनाएँ ज़मीन पर उतरीं। कितनी ज़िंदगियाँ बेहतर हुईं। लेकिन यहाँ आत्ममंथन नहीं, आत्म-प्रचार होता है। आईना नहीं देखा जाता, बस पोस्टर देखे जाते हैं।
आख़िर में सवाल यही है कि जन्मदिन मनाने में बुराई क्या है? बुराई जन्मदिन में नहीं, सत्ता के नशे में डूबे बुढ़ापे में है। बुराई उस सोच में है जो यह मान बैठी है कि देश किसी एक व्यक्ति के बिना नहीं चल सकता। लोकतंत्र व्यक्ति से बड़ा होता है, लेकिन जन्मदिन के मंच पर यह बात सबसे पहले कुचली जाती है।
जन्मदिन घर में मनाइए, परिवार के साथ मनाइए, चुपचाप मनाइए। मोमबत्ती बुझाइए और यह भी सोचिए कि रोशनी किस-किस से छीनी गई। क्योंकि जिस दिन सत्ता में बैठा व्यक्ति अपना जन्मदिन जनता पर बोझ बना दे, उस दिन यह उत्सव नहीं रहता—वह लोकतंत्र की थकान का सार्वजनिक प्रदर्शन बन जाता है।
और तब सवाल यह नहीं रह जाता कि नेता कितने साल का हुआ,सवाल यह होता है कि इन सालों में देश कितना थका, कितना टूटा और कितना चुप कराया गया। अगर इसका जवाब जन्मदिन के शोर में दब जाए, तो समझ लीजिए—
मोमबत्ती नहीं बुझी है, सिर्फ़ जनता की आवाज़ बुझाई जा रही है।












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