चंडीगढ़: शहर की राजनीति में एक बार फिर दल-बदल का मुद्दा गरमा गया है। हाल ही में सामने आई राजनीतिक अदला-बदली को कहीं “घर वापसी” तो कहीं पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतोष का परिणाम बताया जा रहा है। हालांकि, लगातार हो रहे इस तरह के घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक मूल्यों और जनादेश की भावना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जारी प्रेस नोट में सामाजिक चिंतक आर. के. गर्ग ने कहा कि “आया राम, गया राम” की राजनीति ने देश में कई बार स्थिर सरकारों और व्यवस्थाओं को अस्थिर किया है। इसी पृष्ठभूमि में दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया था, जिससे कुछ हद तक सुधार जरूर हुआ, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि हर स्तर पर इसका प्रभाव समान रूप से दिखाई नहीं देता।
उन्होंने विशेष रूप से नगर निगम का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि चुने हुए प्रतिनिधि बार-बार अपना दल बदलते हैं तो जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करती है। यदि वर्तमान हाउस की सूची को मूल जनादेश के आधार पर देखा जाए, तो कई प्रतिनिधियों की राजनीतिक पहचान बदल चुकी है, जो लोकतंत्र की आत्मा के लिए चिंताजनक स्थिति है।
प्रेस नोट में कहा गया है कि आगामी चुनाव निकट हैं और लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के हाथ में होती है। ऐसे में नागरिकों से अपील की गई है कि वे—
जिन प्रतिनिधियों ने दल-बदल किया है,
तथा जिन्होंने इस प्रक्रिया को समर्थन दिया है,
उनके आचरण, निष्ठा और जनसेवा के रिकॉर्ड का गंभीर मूल्यांकन करें।
आर. के. गर्ग ने कहा कि मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का सशक्त माध्यम है। स्वस्थ, पारदर्शी और जनहितकारी राजनीति की पुनर्स्थापना जनता के जागरूक और सोच-समझकर लिए गए निर्णय से ही संभव है।
प्रेस नोट के अंत में शहरवासियों से अपील की गई है कि वे शहर के सम्मान और भविष्य को सर्वोपरि रखते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग करें।











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