April 5, 2026 7:01 pm

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चंडीगढ़ नगर निगम के रोड टेंडर पर उठे सवाल, छोटे ठेकेदारों के लिए अवसर घटने की आशंका: आरके गर्ग

चंडीगढ़ : शहर में सड़कों की री-कार्पेटिंग और मरम्मत के लिए निकाले गए करोड़ों रुपये के टेंडरों को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। बताया जा रहा है कि Chandigarh Municipal Corporation (एमसी) द्वारा हाल ही में करीब 40 करोड़ रुपये से अधिक के रोड टेंडर जारी किए गए हैं, लेकिन इन टेंडरों का आकार इतना बड़ा रखा गया है कि स्थानीय और छोटे ठेकेदारों के लिए उनमें भाग लेना लगभग असंभव हो गया है।
इस मुद्दे पर शहर के वरिष्ठ नागरिक आर.के. गर्ग ने चिंता जताते हुए कहा कि सड़कों के निर्माण और री-कार्पेटिंग के लिए 8 करोड़ से 13 करोड़ रुपये तक के बड़े-बड़े टेंडर पैकेज बनाए गए हैं। उनका कहना है कि इस तरह के टेंडर केवल बड़े कॉन्ट्रैक्टर या बड़ी कंपनियां ही हासिल कर सकती हैं, जबकि स्थानीय और मध्यम स्तर के ठेकेदारों के लिए अवसर लगभग खत्म हो जाते हैं।
छोटे और मध्यम ठेकेदारों के बाहर होने का खतरा
आर.के. गर्ग के अनुसार टेंडर की शर्तें ऐसी रखी गई हैं, जिनमें भारी अर्नेस्ट मनी, 30 प्रतिशत वार्षिक टर्नओवर की शर्त, बड़ी बैंक गारंटी और कड़े तकनीकी मानदंड शामिल हैं।
इन शर्तों के कारण छोटे और मध्यम स्तर के ठेकेदारों के लिए बोली लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है। परिणामस्वरूप प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाती है और टेंडर प्रक्रिया में केवल बड़े कॉन्ट्रैक्टर ही भाग ले पाते हैं।
प्रतिस्पर्धा घटने से सरकार को नुकसान
विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी टेंडर में भाग लेने वाली कंपनियों की संख्या कम हो जाती है तो वास्तविक प्रतिस्पर्धा समाप्त होने लगती है। इससे सरकार को बेहतर दरों पर काम मिलने की संभावना कम हो जाती है और सार्वजनिक धन का सर्वोत्तम उपयोग नहीं हो पाता।
यदि अधिक ठेकेदार प्रतिस्पर्धा में शामिल हों तो सरकार को बेहतर कीमत पर बेहतर गुणवत्ता का काम मिल सकता है।
एकाधिकार बनने का खतरा
आर.के. गर्ग का कहना है कि बड़े-बड़े टेंडर पैकेज बनने से अक्सर कुछ ही बड़ी कंपनियां बार-बार टेंडर जीतने लगती हैं। इससे धीरे-धीरे काम कुछ कंपनियों के हाथों में सिमट जाता है और बाजार में एकाधिकार (Monopoly) बनने का खतरा बढ़ जाता है।
ऐसी स्थिति में पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं।
स्थानीय रोजगार पर पड़ सकता है असर
टेंडर का आकार बड़ा होने का असर केवल ठेकेदारों पर ही नहीं बल्कि स्थानीय रोजगार पर भी पड़ता है। छोटे ठेकेदारों के पास काम कम आने से उनके साथ जुड़े स्थानीय मजदूरों, तकनीशियनों और सप्लायरों को भी रोजगार कम मिलता है।
इसका सीधा असर शहर की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
निगरानी और जवाबदेही भी बनती है चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी एक ठेकेदार को बहुत बड़ा क्षेत्र या कई सड़कों का काम एक साथ दे दिया जाता है, तो उसकी निगरानी करना मुश्किल हो जाता है।
यदि गुणवत्ता खराब होती है या काम में देरी होती है तो जिम्मेदारी तय करना भी कठिन हो जाता है, क्योंकि काम कई क्षेत्रों में फैला होता है।
काम में देरी की आशंका
एक ही एजेंसी को बहुत बड़ा पैकेज देने से काम समय पर पूरा होने का जोखिम भी बढ़ जाता है। बड़े प्रोजेक्ट में संसाधनों का दबाव बढ़ जाता है, जिससे कई बार काम तय समय से पीछे रह जाता है और शहरवासियों को लंबे समय तक खराब सड़कों का सामना करना पड़ता है।
पिछली सर्दियों का उदाहरण भी चर्चा में
शहर में पिछले साल सर्दियों के दौरान जल्दबाजी में बनाई गई कुछ सड़कों की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठे थे। कई जगहों पर नई बनी सड़कें थोड़े ही समय में उखड़ने लगी थीं, जिससे लोगों ने सार्वजनिक धन की बर्बादी का आरोप लगाया था।
आलोचकों का कहना है कि उस अनुभव से सबक लेने के बजाय फिर से बड़े पैकेज वाले टेंडर निकालना चिंता का विषय है।
टेंडर शर्तों पर भी उठे सवाल
आर.के. गर्ग का कहना है कि टेंडर की शर्तों में भारी बैंक गारंटी, ऊंचा टर्नओवर और लंबी पेनल्टी अवधि जैसी शर्तें रखी गई हैं। उनके अनुसार 146 दिन बाद केवल 1 प्रतिशत पेनल्टी का प्रावधान और बड़े क्षेत्र में फैला हुआ कार्यक्षेत्र यह संकेत देता है कि टेंडर प्रक्रिया आम ठेकेदारों के लिए अनुकूल नहीं है।
बेहतर विकल्प क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि नगर निगम वास्तव में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना चाहता है, तो कुछ सुधार किए जा सकते हैं—
सड़कों के काम को छोटे-छोटे पैकेजों में विभाजित किया जाए।
स्थानीय और मध्यम स्तर के ठेकेदारों को भी बोली लगाने का अवसर दिया जाए।
टेंडर प्रक्रिया में अधिक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जाए।
काम की गुणवत्ता की कड़ी निगरानी और समयबद्ध समीक्षा की व्यवस्था की जाए।
शहरवासियों की नजरें निगम पर
चंडीगढ़ के नागरिकों का कहना है कि शहर की सड़कों की गुणवत्ता सीधे तौर पर लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी है। ऐसे में टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और स्थानीय भागीदारी को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए।
अब देखना होगा कि इन चिंताओं पर Chandigarh Municipal Corporation प्रशासन क्या रुख अपनाता है और क्या भविष्य में टेंडर नीति में कोई बदलाव किया जाता है या नहीं।

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Author: BabuGiri Hindi

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