हम अगर मंजिले न बन पाएं,मंजिलों तक रास्ता हो जाएं
देर से सोच में हैं परवाने,राख हो जाएं या हवा हो जाएं
बंदगी हम ने छोड़ दी फराज,क्या करें लोग जब खुद हो जाएं
ये 25 अप्रैल,शनिवार शाम के 6 बजे के आसपास का वक्त था। जनस्वास्थ्य विभाग के इंजीनियर इन चीफ देवेद्र दहिया,चीफ इंजीनियर राजेश बंसल और उनकी टीम दक्षिणी हरियाणा के कुछ गांवों में ग्राउंड जीरो पर जमीनी हालात का मुआयना करने में जुटी थी। मकसद था जमीनी स्तर पर विकास कामों,एसटीपी, पीने के पानी की सप्लाई की व्यवस्था को जांचना-परखना और इसमें जरूरी सुधार करना-करवाना। इसी बीच दक्षिणी हरियाणा के ही एक गांव के सरपंच को देर से ही..शाम को ही ये पता चलता है कि हैडक्वार्टर से सीनियर अफसरों की एक टीम कुछ गांवों का विजिट कर के एसटीपी,पानी की सप्लाई,वाटर टैंक,वाटर वर्क्स में होने वाली समस्याओं का जायजा ले रही है। वो सरपंच उन अफसरों को अपने गांव में बुला कर अपने यहां के बदहाल वाटर टैंक को उनको दिखाना चाहता था,लेकिन उसके पास किसी सीनियर अफसर का मोबाइल नंबर भी नहीं था। जिस किसी से उस ने मोबाइल नंबर प्रबंध करने के लिए फोन किए तो उन्होंने भी उन सरपंच साहब को अटैंड नहीं किया। ये मानिए कि आमतौर पर जैसे बड़े लोगों के निजी स्टाफ का रवैया हो जाता कि चूहे को मिली हल्दी की गांठ और वो खुद को पंसारी समझ बैठा..ठीक इसी तरह के पंसारीनुमा लोगों से इन सरपंच का वास्ता पड़ा। इन मुनीमनुमा छोटे छोटे लोगों के जीवन में यही तो खुशियां होती है कि कोई साहब का मोबाइल मांगे तो ये झट से मंूछों पर ताव देने लग जाते हैं और फिर अकड़ कर कह देंगे कि हमें नहीं पता। इधर, सूर्यास्त का समय करीब आ रहा था और इधर इन सरपंच की बेचैनी बढती जा रही थी। किस तरह से जनस्वास्थ्य विभाग के सीनियर अफसरों को अपने गांव के वाटर वर्क्स का मुआयना करवाया जाए। उनको अपनी व्यथा सुनाई जाई। गांव में पीने के पानी की व्यवस्था को सुधारा जाए। वाटर टैंक की मुरम्मत करवाई जाए। सफाई करवाई जाए। इधर उधर बात बनती न देख इन सरपंच ने इंटरनैट का सहारा लिया और यहां पर उनको एक नंबर मिला चीफ इंजीनियर राजेश बंसल का। इन्होंने झट से चीफ साहब को फोन मिलाया और उधर खट से इन साहब ने पहली रिंग बजते ही सरपंच साहब का फोन उठाया। सरपंच साहब ने इनको अपनी पीड़ा बताई। अपने गांव में आने की गुहार लगाई।
बंसल साहब कहने लगे कि अब तो बहुत देर हो गई। हमारा शिडयूल तो पहले से ही बहुत टाइट है। हमने अभी कई जगह और भी जाना है। हम और इंजीनियर इन चीफ साहब सुबह से ही फील्ड विजिट पर निकले हुए हैं। अलग अलग जगह जा कर मौके का मुआयना कर रहे हैं। अब सूर्यास्त भी होने वाला है। एक या दो सप्ताह बाद वो फिर से इस तरफ का विजिट प्लान करेंगे, तब आपके गांव का पक्का दौरा करेंगे और आपकी समस्याओं का जायजा लेंगे। इन समस्याओं का निराकरण करवाएंगे। उन्होंने सरपंच को आश्वस्त किया कि वो बेफिक्र रहें और वो जल्द ही उनके गांव आएंगे। सरपंच ने गुहार तो बहुत की,लेकिन वो इन अफसर के सामने लाचार था।
खैर..बाद में अचानक से चीफ इंजीनियर का हृदय परिवर्तन हो गया। बेशक उन्होंने सरपंच को आज आने से मना कर दिया था,लेकिन अब उन्होंने आज और अभी उस गांव में विजिट करने की ठानी। उन्होंने पता किया कि उनकी लोकेशन से इन सरपंच का गांव कितना दूर है? पता चला कि पांच सात किलोमीटर ही है। चीफ इंजीनियर ये सोचते रहे कि प्रभावशाली, सिफारिशी और पहुंच वाले लोग तो सरकारों में अपना काम किसी भी तरह करवा ही लेते हैं। हमें तो उनकी भी सुध लेनी है, जिनका कोई नहीं है। जिनकी सिस्टम में पहुंच नहीं है। पूछ नहीं है। बूझ नहीं है। आखिरी पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति की सुनवाई करना ही तो हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इंजीनियरिंग की पढाई के दौरान जो सपने देखे थे कि हम ग्रामीण आंचल के लोगों के उत्थान के लिए भी काम करेंगे तो अब जब ईश्वर ने मौका दिया है तो इसे नहीं चूकना चाहिए। इसे हाथो हाथ लपकना चाहिए। अगर कोई बड़ी सिफारिश आ जाती तब भी तो हम देर रात तक काम करते ही है। अब उन्होंने पहले से तय कार्यक्रम को छोड़ पहले इन्हीं सरपंच के गांव में ही चलने का फैसला किया। अपना काफिला लेकर वो झट से सरपंच के गांव जा पहुंचे।
जब सरपंच को उन्होंने अपनी इस सरप्राइज विजिट के बारे में बताने के लिए फोन किया तो वो सरपंच गांव में मौजूद नहीं थे। वो इसलिए कि खुद चीफ इंजीनियर साहब ने उनको पहले से बता दिया था कि वो आज गांव नहीं आ रहे,अगले विजिट पर आएंगे तो सरपंच अपने निजी काम से किसी अन्य जगह के लिए निकल चुके थे। खैर चीफ इंजीनियर को मौका मुआयना करवाने के लिए गांव के नंबरदार, पंच व अन्य प्रबुद्ध लोग वाटर वर्क्स पर मौजूद थे।
उन्होंने अपनी समस्याएं बताई। चीफ इंजीनियर ने सारी सुनी। अधीनस्थ स्टाफ को जरूरी निर्देश दिए। एस्टीमेट बनाने के लिए कहा। मंजूरी लेने को कहा। मौके पर मौजूद ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि उनकी इन समस्याओं का निराकरण हो जाएगा। इसके बाद चीफ इंजीनियर का कारवां-काफिला बचे हुए अन्य स्थानों पर विजिट के लिए निकल गया। गांव के लोग जनस्वास्थ्य विभाग के इन अफसरों की मुक्तकंठ से सराहना कर रहे थे कि शनिवार की सरकारी छुटटी के दिन-प्रचंड गर्मी में भी ये लोग रात तक शिददत से काम पर हुए हैं। फील्ड में निकले हुए हैं। ये सारा प्रकरण से साबित करता है कि सरकारों में अब भी ऐसे लोग हैं, जो भारत को भारत बनाने के लिए काम करते हैं। ये लोग हमारे देश के-हमारे प्रदेश के सच्चे नायक हैं। बिना किसी स्वार्थ,लोभ, लालच के भी काम करते हैं। जरूरी नहीं कि इस देश में ताकत वालों की ही हमेशा सुनी जाती है। कुछ ऐसे हीरो भी हैं जिन से ये देश रहने लायक बना हुआ है। शायद दुष्यंत कुमार ने कभी ऐसे ही नायकों के लिए लिखा था..
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही,लहरों से टकराती तो है
एक चिंगारी कहीं से ढंूढ कर लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है
एक खंडहर के हृदय सी- एक जंगली फूल सी
आदमी की पीर गंूगी ही सही,गाती तो है
डीसी अंबाला
इजरायल, अमेरिका की इरान से जंग के माहौल से दूर अपने हरियाणा में कुछ अफसर शानदार काम भी कर रहे हैं। अंबाला छावनी के एसडीएम कार्यालय में निजी वाहनों के रजिस्ट्रेशन में एक बड़ा स्कैम सामने आया। एक ही बरस में पंजीकृत हुए 797 वाहनों में 381 वाहन चालकों का स्थाई पता अंबाला छावनी से बाहर का था। इनमें से भी 216 तो हरियाणा से बाहर के राज्यों के थे। चंूकि हरियाणा में वाहन पंजीकरण की दर अन्य राज्यों से कम है तो एक गिरोह टैक्स बचाने के चक्कर में अंबाला छावनी के एसडीएम कार्यालय के स्टाफ की मिलीभगत से इस कांड को अंजाम दे रहा था। उनके इस कांड से एक बरस में सरकार को कई करोड़ का चूना लगने की आशंका है। अंबाला के डीसी अजय तोमर ने जब रूटीन में एसडीएम आफिस की कुछ फाइलों को एग्जामिन किया तो उनकी पैनी नजर में झट से गोलमाल आ गया। इस मामले में एफआईआर भी दर्ज हो गई है। अजय तोमर ने ये कांड तो पकड़ा, लेकिन इसमें खुद की वाहवाही लूटने- लेने की कोशिश नहीं की। इलैक्ट्रानिक मीडिया-सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने उन से इस बाबत आन कैमरा-आफ कैमरा बात करने के लिए कई दफा कोशिश की, लेकिन वो कहीं लाइमलाइट में नहीं आए। आईआईटी खड़गपुर से पढे अजय तोमर नींव की र्इंट की तरह काम करना पंसद करते हैं और मीडिया की चकाचौंध से दूर रहते हैं। आईएएस अफसरों को मंसूरी में ट्रेनिंग के दौरान पढाया जाता है कि योग:कर्मसु कौशलम् यानी कर्म में उत्कृष्टता ही योग है। ये भारतीय प्रशासनिक सेवा का मुख्य आदर्श वाक्य भी है। इन अफसरों को ये बताया जाता है कि उनको प्रचार प्रसार से खुद को दूर रखना है। अपनी निजी छवि को गढने,सजाने संवारने की बजाय सरकार की नीतियों को कुशलता,समर्पण और निष्पक्षता से निभाना ही सर्वोच्च कर्म है। वह अलग मसला है कि आजकल तो कई आईएएस अफसर अपनी पहली पोस्टिंग से ही सोशल मीडिया पर फोटोबाजी, इंटरव्यूबाजी और अखबारबाजी पर उतर आते हैं। अनायास ही ये जनता को बतला जाते हैं कि अभी दौलत नई नई है। अजय तोमर के नायाब अंदाज पर कहा जा सकता है..
लगता तो बेखबर सा हंू,लेकिन खबर में हंू
अगर तेरी नजर में हंू तो सबकी नजर में हंू
समस्या अपनी अपनी
गरीबों के सामने गैस का सिलेंडर ना मिलना जैसी समस्याएं रहती हैं। इधर, बड़े लोगों की जान को कुछ अलग ही मसले गले पड़े होते हैं। जैसे कि पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट की एक महिला न्यायधीश ने चंडीगढ प्रशासन के एक सीनियर अफसर से कहा कि उनके निजी सुरक्षा कर्मी-पीएसओ अपनी डयूटी को गंभीरता से नहीं करते। जब देखो मोबाइल पर सोशल मीडिया देखने में बिजी रहते हैं। लिहाजा, इनको डयूटी से बदला जाए। वो अधिकारी कहने लगे-मैडम मैं तो खुद ही इस समस्या से पीड़ित हंू। मेरे सुरक्षा कर्मी तो ऐसे हैं चाहे सिर पर तलवार रख दो,लेकिन सोशल मीडिया से दूर नहीं रह सकते। इस चक्कर में इनकी आंखें भी खराब हो रही है,लेकिन मजाल क्या कि एक सैकिंड भी मोबाइल फोन अपनी आंख से दूर हटा दें। मोबाइल फोन में तो इनकी जान बसती है।
श्यामलाल बंसल
विधानसभा के तीन चुनाव लड़ चुके श्यामलाल बंसल पर आखिरकार किस्मत मेहरबान हो गई है। उनको भाजपा ने पंचकूला से मेयर पद का उम्मीदवार बना दिया है। अतीत में भाजपा उनको एक तरह से बलि का बकरा सा बनाती रही। जब पार्टी मुश्किल में थी तब तो उनको विधानसभा चुनाव की टिकट देती रही और जब उनके जीतने का नंबर आया तो ज्ञानचंद गुप्ता को चंडीगढ से लाकर पंचकूला से टिकट थमा दी। पहले भी बंसल का नाम मेयर के दावेदरों में था,लेकिन इनैलो से दलबदल कर आए कुलभूषण गोयल को भाजपा ने टिकट दे दी। इस दफा भी कांग्रेस से भाजपा में आए एक अन्य दलबदलू तरूण भंडारी का नाम मेयर पद के उम्मीदवारों के लिए चर्चा में था,लेकिन पार्टी ने अपने पुराने वफादार बंसल पर दांव लगाने का फैसला किया। नरेंद्र मोदी जब हरियाणा के प्रभारी थे तब से बंसल की उन से नजदीकी रही है। बंसल के लांच किए हुए कई प्रोडेक्ट कहां से कहां पहुंच गए,अर्श से फर्श तक पहुंच गए, विधानसभा से लेकर संसद तक पहुंच गए,लेकिन खुद वो अभी तक यहीं ठिठके हुए थे। हो सकता है कि इस दफा उनकी मुराद कुछ पूरी हो जाए। इस हालात पर कहा जा सकता है..
जिसने मेरी ही तरफ तीर चलाया…मैं था
और जो इस तीर से बच कर निकल आया..मैं था
इन चिरागों के अब इतने भी कसीदे न पढो
यार,तुमने जिसे रातों को जलाया..मैं था
खाक पर ढेर हैं कातिल ये करिश्मा क्या है
कि निशाने पे तो मुददत से खुदाया..मैं था










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