— डॉ. प्रियंका सौरभ
हालिया एलपीजी संकट ने देश की सबसे चर्चित कल्याणकारी योजनाओं में से एक, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मार्च 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के अवरुद्ध होने की आशंका ने भारत की ऊर्जा निर्भरता की कमजोरियों को उजागर कर दिया। आयात पर अत्यधिक निर्भर भारत में जैसे ही आपूर्ति बाधित हुई, देशभर में गैस सिलेंडरों की किल्लत, लंबी कतारें और ग्रामीण रसोईघरों की बुझती आंच एक कठोर वास्तविकता बनकर सामने आई।
2016 में शुरू हुई उज्ज्वला योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों, विशेषकर महिलाओं, को धुएं से मुक्ति दिलाकर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था। इस योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन वितरित किए गए और एलपीजी कवरेज 95 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया—जो निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन यह संकट यह बताने के लिए पर्याप्त है कि केवल कनेक्शन देना ही समाधान नहीं है, बल्कि उसकी निरंतर उपलब्धता और वहनीयता भी उतनी ही आवश्यक है।
जमीनी सच्चाई यह है कि उज्ज्वला लाभार्थी औसतन साल में केवल 3–4 बार ही सिलेंडर रिफिल कराते हैं, जबकि नियमित उपयोग के लिए 8–10 रिफिल जरूरी होते हैं। सब्सिडी के बावजूद 600–800 रुपये प्रति सिलेंडर की लागत दैनिक आय पर निर्भर परिवारों के लिए भारी पड़ती है। यही कारण है कि कई परिवार फिर से लकड़ी और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट जाते हैं। ऐसे में गैस कनेक्शन “सुविधा” से अधिक “आपातकालीन विकल्प” बनकर रह जाता है।
यह संकट केवल कीमतों या मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की आपूर्ति श्रृंखला की संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर करता है। भारत की एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है, जबकि घरेलू उत्पादन अपेक्षाकृत कम है। भंडारण क्षमता भी सीमित है—बताया जाता है कि देश के पास महज कुछ दिनों का ही रणनीतिक भंडार है। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ता है। पूर्वोत्तर और दूरदराज के क्षेत्रों में यह स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है, जहां भौगोलिक बाधाएं वितरण को और कठिन बना देती हैं।
डिजिटल व्यवस्था ने पारदर्शिता तो बढ़ाई है, लेकिन डिजिटल विभाजन ने नई असमानताएं भी पैदा की हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और तकनीकी साक्षरता की कमी के कारण गैस बुकिंग, सब्सिडी ट्रैकिंग और शिकायत निवारण जैसी प्रक्रियाएं कई लोगों के लिए जटिल बनी हुई हैं। इससे यह विडंबना सामने आती है कि जो प्रणाली समावेशन के लिए बनाई गई थी, वही कई बार बहिष्करण का कारण बन जाती है।
वास्तव में, यह समस्या केवल उज्ज्वला योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की व्यापक कल्याणकारी नीतियों की संरचना से जुड़ी है। अनेक योजनाएं कागजों पर व्यापक दिखती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित रह जाता है। जागरूकता की कमी, जटिल प्रक्रियाएं, कमजोर निगरानी और कभी-कभी भ्रष्टाचार इन योजनाओं के प्रभाव को कम कर देते हैं। नतीजतन, योजनाएं “सर्वव्यापी” होने के बजाय “चयनात्मक” बन जाती हैं।

संकट के समय सरकार द्वारा उठाए गए तात्कालिक कदम राहत तो देते हैं, लेकिन वे स्थायी समाधान नहीं होते। ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि भारत आयात निर्भरता कम करे, घरेलू उत्पादन बढ़ाए और भंडारण क्षमता का विस्तार करे। साथ ही, बायोगैस, सौर ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना समय की मांग है। डिजिटल समावेशन को भी प्राथमिकता देनी होगी, ताकि कोई भी लाभार्थी केवल तकनीकी कारणों से वंचित न रह जाए।
अंततः, यह संकट एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—कल्याण केवल योजनाओं की संख्या या कनेक्शनों के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। असली कसौटी यह है कि जरूरतमंद व्यक्ति तक सुविधा कितनी नियमित, सस्ती और विश्वसनीय तरीके से पहुंच रही है। उज्ज्वला योजना ने निस्संदेह लाखों जीवनों को प्रभावित किया है, लेकिन इसकी स्थिरता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना अब सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत की कल्याण यात्रा को अब केवल विस्तार नहीं, बल्कि गहराई, स्थायित्व और लचीलापन भी चाहिए—ताकि अगली बार कोई संकट आए, तो सबसे कमजोर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित न हो, बल्कि सबसे सुरक्षित रहे।











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