निजी स्कूलों में बढ़ती मनमानी से अभिभावक परेशान, पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत
लेख: डॉ. सत्यवान सौरभ
शिक्षा को हमेशा समाज की आत्मा, प्रगति का आधार और समान अवसरों का माध्यम माना गया है। यह केवल ज्ञान प्राप्त करने का जरिया नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाने की प्रक्रिया भी है। लेकिन जब यही शिक्षा मुनाफे का जरिया बनने लगे, तो यह न सिर्फ चिंता का विषय है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी भी है।
हाल ही में सामने आया मामला—जहां कुछ निजी स्कूलों द्वारा किताबों की बिक्री पर 50 प्रतिशत तक कमीशन लिया जा रहा है—इस दिशा में गंभीर सवाल खड़े करता है। यह सिर्फ एक अनियमितता नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्य पर सीधा प्रहार है।
किताबों के नाम पर जबरन वसूली
आज कई निजी स्कूल अभिभावकों को यह निर्देश देते हैं कि वे केवल स्कूल द्वारा तय दुकानों से ही किताबें खरीदें या सीधे स्कूल से ही लें। इससे एक तरह की ‘मोनोपॉली’ बन जाती है, जिसमें अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।
खुले बाजार में वही किताबें सस्ती मिल सकती हैं, लेकिन मजबूरी में अभिभावकों को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इस अतिरिक्त राशि का बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में जाता है।
पारदर्शिता का अभाव और हर साल नई किताबों का खेल
इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी कमी है—पारदर्शिता की। अभिभावकों को यह नहीं बताया जाता कि किताबों का चयन किन मानकों पर हुआ और उनकी असली कीमत क्या है।
अक्सर देखा गया है कि हर साल किताबें बदल दी जाती हैं, ताकि पुरानी किताबें बेकार हो जाएं और अभिभावकों को नई खरीदने के लिए मजबूर किया जा सके। यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि संसाधनों की बर्बादी भी है।
शिक्षा से ज्यादा कमाई पर फोकस
जब स्कूल ज्ञान के केंद्र के बजाय कमाई के साधन बन जाते हैं, तो शिक्षा का स्तर स्वतः गिरने लगता है। शिक्षक-छात्र संबंध, जो विश्वास और मार्गदर्शन पर आधारित होता है, धीरे-धीरे एक औपचारिक लेन-देन में बदल जाता है।
ऐसे माहौल में बच्चों के समग्र विकास की बजाय संस्थान का आर्थिक लाभ प्राथमिकता बन जाता है।
अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ
इस पूरे सिस्टम का सबसे ज्यादा असर अभिभावकों पर पड़ता है। मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के लिए यह खर्च भारी बोझ बन जाता है। कई परिवार अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं।
यह प्रवृत्ति सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है, जहां अच्छी शिक्षा केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित होती जा रही है।
शिक्षा विभाग की निष्क्रियता पर सवाल
नियम साफ कहते हैं कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसके बावजूद यह प्रथा खुलेआम चल रही है।
यह सवाल उठता है कि क्या नियमों का पालन नहीं हो रहा, या फिर उन्हें लागू कराने की इच्छाशक्ति की कमी है?
समाधान क्या है?
इस समस्या का समाधान केवल आलोचना नहीं, बल्कि ठोस कदमों में है—
शिक्षा विभाग द्वारा सख्त जांच और कार्रवाई
किताबों की कीमत और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता
किताबों की सूची ऑनलाइन उपलब्ध कराना
सिलेबस में अनावश्यक बदलावों पर रोक
अभिभावकों की जागरूकता और एकजुटता
निष्कर्ष
हमें यह समझना होगा कि शिक्षा कोई वस्तु नहीं है, जिसे मुनाफे के लिए बेचा जाए। यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है, जो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करती है।
अगर समय रहते इस व्यावसायीकरण पर रोक नहीं लगी, तो वह दिन दूर नहीं जब शिक्षा पूरी तरह बाजार का हिस्सा बन जाएगी—जहां किताबों में ज्ञान नहीं, बल्कि मुनाफे का गणित लिखा होगा।
आज जरूरत है शिक्षा को उसके मूल स्वरूप में वापस लाने की—जहां उद्देश्य लाभ नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और समान अवसर हो।











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