(एक रुपये के दिखावे के पीछे छिपा “भात” और “रिवाज़” का सच—क्या सच में खत्म हो रही है दहेज़ प्रथा या सिर्फ बदल रहा है उसका रूप?)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता है। यह संबंध परंपराओं, रीति-रिवाज़ों और सामाजिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा होता है। लेकिन जब इन परंपराओं के पीछे छिपी मानसिकता पर सवाल उठता है, तो एक कड़वा सच सामने आता है—हमने बुराइयों को छोड़ा नहीं है, बस उनका रूप बदल दिया है।
आजकल शादियों में एक नया चलन तेजी से उभर रहा है। बड़े गर्व के साथ कहा जाता है—“हमने दहेज़ नहीं लिया।” यह सुनकर लगता है कि समाज बदल रहा है, सोच आधुनिक हो रही है। लेकिन जैसे-जैसे विवाह की रस्में आगे बढ़ती हैं, यह आदर्शवाद धीरे-धीरे एक प्रतीकात्मक दिखावे में बदलता नजर आता है।
थाली में सजी नगदी, सोना-चांदी और महंगे उपहार—सब कुछ सलीके से सजाया जाता है। फिर एक छोटा-सा अभिनय होता है—लड़का या उसका परिवार उस ढेर में से केवल एक रुपया उठाता है, मानो यह प्रमाण दे रहा हो कि उन्होंने दहेज़ नहीं लिया। शेष सब कुछ “भात”, “शगुन”, “उपहार” या “रिवाज़” के नाम पर स्वीकार कर लिया जाता है।
यह दृश्य केवल एक रस्म नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक मानसिकता का आईना है। असली सवाल यह नहीं कि एक रुपया लिया गया या नहीं; असली प्रश्न यह है कि क्या लड़की के परिवार पर आर्थिक या सामाजिक दबाव पड़ा या नहीं।
दहेज़ प्रथा सदियों से भारतीय समाज की एक गंभीर समस्या रही है। पहले इसे खुले तौर पर माँगा जाता था—नकदी, गाड़ियाँ, गहने। समय बदला, कानून सख्त हुए, जागरूकता बढ़ी और इसके खिलाफ आवाजें भी उठीं। लेकिन क्या दहेज़ सच में खत्म हुआ? शायद नहीं। आज इसने अपना स्वरूप बदल लिया है। अब इसे सीधे माँगना अस्वीकार्य माना जाता है, इसलिए इसे परंपरा और सम्मान की आड़ में छिपा दिया गया है।
“भात”, “तिलक”, “सगाई के उपहार” और “विदाई के तोहफे”—नाम भले बदल गए हों, लेकिन लेन-देन की प्रवृत्ति वही बनी हुई है। जो कभी स्नेह और आत्मीयता का प्रतीक था, वही आज कई जगह सामाजिक प्रतिस्पर्धा और दिखावे का माध्यम बन गया है।
कितना सोना दिया गया, कितनी नगदी रखी गई, कितने महंगे वस्त्र दिए गए—अब इन्हीं पैमानों पर “इज्जत” का मूल्यांकन होने लगा है। यह प्रवृत्ति आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर बोझ डालती है और मध्यम वर्ग को अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने के लिए मजबूर करती है।
दिखावे की यह संस्कृति आज के समाज की बड़ी विडंबना है। सोशल मीडिया ने इसे और बढ़ावा दिया है, जहाँ हर शादी एक “इवेंट” बन गई है। “हमने दहेज़ नहीं लिया” जैसे वाक्य भी कई बार नैतिकता से अधिक छवि निर्माण का हिस्सा बन जाते हैं। इससे एक भ्रम पैदा होता है कि दहेज़ खत्म हो रहा है, जबकि सच्चाई इसके उलट होती है।
दहेज़ का सबसे खतरनाक रूप वह है जो दिखाई नहीं देता—जो अनकहा होता है। कोई खुलकर कुछ नहीं मांगता, लेकिन अपेक्षाएँ स्पष्ट रहती हैं। “हमें कुछ नहीं चाहिए, आप अपनी खुशी से कर दीजिए” या “समाज में इज्जत भी तो रखनी होती है”—ये वाक्य सहज लगते हैं, लेकिन इनके पीछे गहरा सामाजिक दबाव छिपा होता है। यही दबाव दहेज़ को मजबूरी बना देता है।
कानून दहेज़ को अपराध घोषित करता है, लेकिन कानून केवल व्यवहार को नियंत्रित कर सकता है, मानसिकता को नहीं। जब तक समाज स्वयं यह स्वीकार नहीं करेगा कि यह प्रथा गलत है, तब तक कोई भी कानून इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।
वास्तविक बदलाव के लिए हमें अपने दृष्टिकोण और व्यवहार दोनों को बदलना होगा। परंपराओं का पुनर्मूल्यांकन करना होगा—यह तय करना होगा कि कौन-सी परंपराएँ सार्थक हैं और कौन-सी केवल दिखावे और दबाव का माध्यम बन चुकी हैं। “भात” और “उपहार” तभी तक उचित हैं, जब वे पूरी तरह स्वेच्छा और सामर्थ्य के भीतर हों।
विवाह को सादगी और गरिमा के साथ स्वीकार करना होगा। यह समझना होगा कि यह कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और समानता का संबंध है। इसमें सबसे बड़ी जिम्मेदारी लड़के और उसके परिवार की है। उन्हें स्पष्ट रूप से यह तय करना होगा कि वे किसी भी रूप में, किसी भी नाम से लेन-देन स्वीकार नहीं करेंगे।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि सम्मान धन से नहीं, मूल्यों से आता है। जब तक समाज खर्च को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखता रहेगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
अब समय आ गया है कि हम केवल यह कहने का दिखावा न करें कि “हमने दहेज़ नहीं लिया”, बल्कि वास्तव में ऐसी स्थिति पैदा करें जहाँ किसी को कुछ देने या लेने की आवश्यकता ही न पड़े।
दहेज़ के खिलाफ असली जीत तब होगी—
जब एक रुपये का प्रतीकात्मक नाटक समाप्त होगा,
जब “रिवाज़” के नाम पर होने वाला लेन-देन रुकेगा,
और जब विवाह सच में समानता, सम्मान और प्रेम का बंधन बनेगा—
न कि लेन-देन का सौदा।











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