April 19, 2026 12:16 pm

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चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव नजदीक: पार्षदों ने पार्कों को बनाया राजनीति का प्लेटफॉर्म, जनता मांग रही पिछले वादों का हिसाब

रमेश गोयत
चंडीगढ़, 18 अप्रैल। चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, शहर की राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। हर वार्ड में चुनावी सरगर्मी साफ दिखाई देने लगी है। पांच वर्षों तक जिन मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी बनी रही, अब वही मुद्दे चुनावी मंचों पर सबसे अधिक सुनाई दे रहे हैं। खासकर शहर के पार्क, जो लंबे समय तक उपेक्षा, अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का शिकार रहे, अब राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र बन चुके हैं।
शहर के कई वार्डों में यह तस्वीर साफ दिखाई दे रही है कि जिन पार्कों में महीनों तक सफाई नहीं हुई, जहां घास सूख चुकी थी, बच्चों के झूले टूटे पड़े थे, बेंच जर्जर हो चुकी थीं और जहां सुबह-शाम सैर करने आने वाले लोगों को धूल और गंदगी का सामना करना पड़ता था—वहीं अब चुनावी बैठकों के लिए कुर्सियां लगाई जा रही हैं। चाय-पानी के साथ जनसंपर्क अभियान चल रहे हैं और नए वादों की लंबी सूची तैयार की जा रही है।
स्थानीय लोग इसे “चुनावी सजावट” कह रहे हैं। उनका साफ कहना है कि पांच साल तक जिन पार्कों की सुध नहीं ली गई, अब चुनाव आते ही वही पार्क वोट मांगने का सबसे बड़ा मंच बन गए हैं। रविवार को चंडीगढ़ की एक महिला पार्षद ने स्थानीय पार्क में ही अपने वार्ड की पार्षद चौपाल लगा दी।

पार्कों की बदहाली बनी जनता की नाराजगी का कारण
चंडीगढ़ को देश के सबसे योजनाबद्ध शहरों में गिना जाता है। यहां के सेक्टर आधारित विकास मॉडल में पार्कों की विशेष भूमिका रही है। हर सेक्टर में हरियाली, खुले मैदान और सार्वजनिक पार्क सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा माने जाते हैं। बच्चों के खेलने से लेकर बुजुर्गों की सैर, महिलाओं की बैठकों और सामुदायिक मेलजोल तक—पार्क शहर की सामाजिक संरचना का मजबूत हिस्सा हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई वार्डों के पार्कों की हालत लगातार खराब होती गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पार्षदों ने अपने कार्यकाल में पार्कों की ओर ध्यान ही नहीं दिया। न तो नियमित सफाई हुई, न माली की नियुक्ति पर ध्यान दिया गया और न ही पौधों, फूलों और हरियाली को बचाने के लिए गंभीर प्रयास किए गए।
कई जगहों पर बच्चों के झूले टूटे पड़े हैं। कई पार्कों में स्ट्रीट लाइट खराब हैं, जिससे शाम के बाद वहां जाना मुश्किल हो जाता है। ओपन जिम उपकरण जंग खा रहे हैं। बुजुर्गों के बैठने के लिए बनी बेंच टूट चुकी हैं। कई पार्कों में आवारा पशु और कूड़े के ढेर आम दृश्य बन चुके हैं।

एक स्थानीय निवासी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा,
“पांच साल तक ना फूल दिखे, ना माली दिखा, सिर्फ धूल उड़ती रही। अब चुनाव नजदीक आए तो वही पार्क बैठक, जनसंपर्क और वोट मांगने का मंच बन गए हैं।”

पार्कों में लगने लगी चुनावी चौपाल
जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे पार्कों में राजनीतिक हलचल बढ़ती जा रही है। कई वार्डों में पार्षद, पूर्व पार्षद और संभावित उम्मीदवार पार्कों में बैठकों का आयोजन कर रहे हैं। सुबह और शाम के समय पार्कों में लोगों को बुलाकर समस्याएं सुनी जा रही हैं। नई योजनाओं और विकास कार्यों के वादे किए जा रहे हैं।
जहां पहले पार्कों में सफाई कर्मचारी भी नजर नहीं आते थे, वहां अब अचानक सफाई अभियान शुरू हो गए हैं। घास कट रही है, पौधे लगाए जा रहे हैं, टूटी बेंचों की मरम्मत हो रही है और दीवारों पर रंग-रोगन किया जा रहा है।
स्थानीय नागरिक इसे केवल चुनावी तैयारी मान रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यही काम पूरे कार्यकाल में होता, तो आज पार्कों की यह हालत नहीं होती।
एक महिला निवासी ने कहा,
“हमारे बच्चों को खेलने के लिए सुरक्षित जगह नहीं थी। बुजुर्ग धूल में बैठते थे। अब चुनाव आया तो सबको पार्क याद आ गए।”

जनता पूछ रही—पिछला मेनिफेस्टो कहां गया?
इस बार सबसे बड़ा सवाल जनता की ओर से यही उठ रहा है कि पिछले चुनाव में किए गए वादों का क्या हुआ? हर चुनाव में उम्मीदवार नया घोषणापत्र लेकर आते हैं—सड़कें बनवाने, पार्क सुधारने, सीवरेज व्यवस्था दुरुस्त करने, स्ट्रीट लाइट लगाने, सामुदायिक केंद्रों को बेहतर बनाने और सफाई व्यवस्था मजबूत करने के वादे किए जाते हैं।
लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन वादों का बड़ा हिस्सा केवल कागजों तक सीमित रह गया। कई वार्डों में आज भी सड़कें टूटी हुई हैं, सीवरेज की समस्या बनी हुई है, सफाई व्यवस्था कमजोर है और पार्क बदहाल हैं।

एक वरिष्ठ नागरिक ने कहा,
“हर चुनाव में नया मेनिफेस्टो आता है, लेकिन पुराना कोई याद नहीं करता। इस बार हम पूछ रहे हैं कि जो वादे पांच साल पहले किए गए थे, उनका क्या हुआ?”
यही सवाल अब पार्षदों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। लोग अब केवल नए वादों से संतुष्ट नहीं हैं। वे पिछले कामों का हिसाब चाहते हैं।

महिलाओं और बुजुर्गों में सबसे अधिक नाराजगी
पार्कों की बदहाल स्थिति को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी महिलाओं और बुजुर्गों में देखी जा रही है। महिलाओं का कहना है कि पार्क उनके लिए सामाजिक संवाद और बच्चों के साथ समय बिताने का सुरक्षित स्थान होते हैं, लेकिन कई जगहों पर असुरक्षा, गंदगी और रखरखाव की कमी के कारण वे वहां जाने से बचती हैं।
बुजुर्गों के लिए सुबह-शाम की सैर और बैठने की सुविधा बेहद जरूरी होती है। लेकिन टूटी बेंच, खराब लाइट और असमान रास्तों के कारण उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती है।
कई वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय पार्षद पार्कों में बैठकर उनसे समर्थन मांगते हैं, लेकिन बाकी समय उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता।

विपक्ष भी बना रहा बड़ा मुद्दा
नगर निगम चुनाव को देखते हुए विपक्षी दल भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सत्ताधारी पार्षदों ने पूरे कार्यकाल में जनता की समस्याओं की अनदेखी की और अब चुनाव से ठीक पहले दिखावटी विकास कार्य शुरू कर दिए हैं।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि पार्षदों ने पांच साल तक सही तरीके से काम किया होता, तो आज जनता को पुराने वादों का हिसाब मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव में “लोकल परफॉर्मेंस” सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है। लोग पार्टी के नाम से ज्यादा उम्मीदवार के व्यक्तिगत कामकाज को महत्व दे रहे हैं।

नया मेनिफेस्टो तैयार, पुरानी जवाबदेही गायब
सूत्रों के अनुसार कई पार्षद और संभावित उम्मीदवार अगले चुनाव के लिए नया मेनिफेस्टो तैयार कर रहे हैं। इसमें स्मार्ट पार्क, बेहतर सफाई व्यवस्था, महिलाओं के लिए विशेष सुविधाएं, युवाओं के लिए ओपन जिम, वरिष्ठ नागरिकों के लिए बैठने की बेहतर व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी और आधुनिक सार्वजनिक सुविधाओं जैसे वादे शामिल किए जा रहे हैं।
लेकिन जब नागरिक पिछले घोषणापत्र पर सवाल उठाते हैं, तो अधिकांश जनप्रतिनिधि इस विषय पर खुलकर बात करने से बचते दिखाई देते हैं।
यही कारण है कि जनता के बीच भरोसे का संकट बढ़ रहा है। लोग अब केवल वादों की सूची नहीं, बल्कि काम की रिपोर्ट मांग रहे हैं।

चुनाव में पार्क बनेंगे बड़ा मुद्दा
चंडीगढ़ जैसे योजनाबद्ध शहर में पार्क केवल हरियाली का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन का केंद्र होते हैं। ऐसे में उनकी बदहाल स्थिति और चुनावी उपयोग अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।
पार्कों की हालत सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन, पार्षदों की सक्रियता और वार्ड स्तर की जवाबदेही को दर्शाती है। इसलिए इस बार चुनाव में पार्क सिर्फ हरियाली का नहीं, बल्कि जवाबदेही का मुद्दा बन गए हैं।

जनता का साफ संदेश है—
“इस बार केवल वादों से काम नहीं चलेगा, काम का हिसाब देना होगा।”
नगर निगम चुनाव की तारीख भले अभी घोषित न हुई हो, लेकिन वार्डों में चुनावी परीक्षा शुरू हो चुकी है। पार्क अब केवल सैर की जगह नहीं, बल्कि राजनीतिक मूल्यांकन का मैदान बन चुके हैं।
इस बार फैसला केवल पार्टी नहीं, बल्कि प्रदर्शन पर होगा—और जनता अब पहले से ज्यादा जागरूक और सवाल पूछने के लिए तैयार है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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