स्वतंत्र सोच, अपनी शैली और बड़े सपनों की उड़ान
रमेश गोयत
भारतीय सिनेमा की चमक-दमक के बीच कुछ ऐसे फिल्मकार भी होते हैं, जो भीड़ से अलग अपनी राह चुनते हैं। वे न तो केवल ग्लैमर के पीछे भागते हैं और न ही त्वरित प्रसिद्धि के मोह में पड़ते हैं। उनका उद्देश्य होता है—कला के माध्यम से अपनी आत्मा की आवाज़ को अभिव्यक्त करना। ऐसे ही एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार हैं करण समर्थ, जो स्वयं को केवल अभिनेता, लेखक या निर्देशक नहीं, बल्कि एक “एक्सपेरिमेंटल फिल्ममेकर” के रूप में पहचान देते हैं।
करण समर्थ का मानना है कि फिल्म निर्माण केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, दर्शन और आत्म-अभिव्यक्ति का गहरा साधन है। वे अपनी अलग शैली, अपने अनुभव और अपनी रचनात्मक दृष्टि पर विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपनी फिल्मों को भी पारंपरिक व्यावसायिक सिनेमा से अलग रखा है।
ऑनलाइन प्रसिद्धि नहीं, वास्तविक सृजन पर विश्वास
आज के डिजिटल युग में जहाँ अधिकांश कलाकार सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपनी पहचान बनाने में लगे रहते हैं, वहीं करण समर्थ इस प्रवृत्ति से अलग खड़े दिखाई देते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उन्होंने अभी तक अपने काम को सार्वजनिक मंचों पर अपलोड नहीं किया है, क्योंकि वे इस प्रकार की डिजिटल प्रसिद्धि में विश्वास नहीं रखते।
उनका मानना है कि किसी कलाकार का मूल्य उसके सोशल मीडिया फॉलोअर्स या ऑनलाइन प्रचार से नहीं, बल्कि उसकी कला, संवेदना और दृष्टिकोण से तय होना चाहिए। यही वजह है कि वे लोगों से आग्रह करते हैं कि उन्हें इंटरनेट पर खोजने या उनके कार्य को ऑनलाइन आंकने की कोशिश न करें।
वे कहते हैं कि कला का वास्तविक मूल्य समय के साथ सामने आता है, न कि केवल ट्रेंडिंग पोस्ट्स या वायरल वीडियोज़ के माध्यम से।
गोवा की धरती पर जन्मी दो प्रयोगधर्मी हिंदी फीचर फिल्में
करण समर्थ की सबसे बड़ी उपलब्धियों में उनकी दो पूर्ण लंबाई की हिंदी फीचर फिल्में शामिल हैं, जो पूरी तरह गोवा में शूट की गई हैं। इन फिल्मों की खास बात यह है कि इनमें स्थानीय कलाकारों को अवसर दिया गया है और पूरी निर्माण प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से परिवार के सहयोग से पूरी की गई है।
आज जब अधिकांश फिल्म निर्माण बड़े प्रोडक्शन हाउस, कॉर्पोरेट निवेश और मार्केटिंग रणनीतियों के अधीन हो चुका है, तब करण समर्थ ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी फिल्मों को स्वतंत्र रूप से पूरा किया। यह केवल आर्थिक साहस नहीं, बल्कि रचनात्मक स्वतंत्रता की मिसाल भी है।
उनकी ये दोनों फिल्में फिलहाल पोस्ट-प्रोडक्शन के चरण में हैं और जल्द ही रिलीज़ की उम्मीद है। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि इन फिल्मों की तुलना इस समय बॉलीवुड या हॉलिवुड से करना उचित नहीं होगा, क्योंकि ये पूरी तरह स्वतंत्र, पारिवारिक सहयोग से निर्मित और प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण पर आधारित हैं।
सिनेमा: व्यवसाय नहीं, साधना
करण समर्थ के लिए सिनेमा केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि एक साधना है। वे अपने कार्य में भारतीय दर्शन, आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं को विशेष स्थान देते हैं। उनके विचारों में “हॉलिवुड से सनातन तक” की यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि वैचारिक और आध्यात्मिक यात्रा है।
वे मानते हैं कि भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों में इतनी गहराई है कि यदि उन्हें ईमानदारी से पर्दे पर उतारा जाए, तो विश्व स्तर पर उसकी अलग पहचान बन सकती है।
उनकी फिल्मों और लेखन में यह दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है—जहाँ मनोरंजन के साथ विचार, प्रश्न और आत्मचिंतन भी उपस्थित रहता है।
अभिनेता, लेखक और निर्देशक—एक बहुआयामी व्यक्तित्व
करण समर्थ केवल निर्देशन तक सीमित नहीं हैं। वे अभिनेता भी हैं, लेखक भी और फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया को भीतर से समझने वाले सर्जक भी। यही बहुआयामी अनुभव उन्हें एक अलग दृष्टि प्रदान करता है।
एक अभिनेता के रूप में वे पात्र की संवेदना को महसूस करते हैं, लेखक के रूप में कहानी की आत्मा को गढ़ते हैं और निर्देशक के रूप में उसे दृश्य रूप देते हैं। यही समग्र समझ उनकी फिल्मों को विशिष्ट बनाती है।
वे मानते हैं कि सिनेमा में तकनीक महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है—भावना और सत्य। यदि कहानी ईमानदार है, तो सीमित संसाधन भी उसे प्रभावशाली बना सकते हैं।
IIFF Goa & Mumbai में कलात्मक नेतृत्व
करण समर्थ Artistic Director – IIFF Goa & Mumbai के रूप में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इस मंच के माध्यम से वे स्वतंत्र और वैकल्पिक सिनेमा को प्रोत्साहन देने का कार्य कर रहे हैं।
उनका उद्देश्य केवल फिल्में बनाना नहीं, बल्कि नए कलाकारों, लेखकों, निर्देशकों और तकनीशियनों को एक ऐसा मंच देना है जहाँ वे बिना किसी दबाव के अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त कर सकें।
विशेष रूप से गोवा और मुंबई जैसे सिनेमा केंद्रों में स्वतंत्र फिल्म निर्माण को नई दिशा देना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
पत्रकारिता और सिनेमा का संगम
करण समर्थ INN Bharat Mumbai National News Agency में Editor के रूप में भी कार्यरत हैं। यह भूमिका उनके व्यक्तित्व के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष को दर्शाती है।
पत्रकारिता और सिनेमा दोनों ही समाज के आईने हैं—एक शब्दों के माध्यम से, दूसरा दृश्य के माध्यम से। करण समर्थ इन दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रहकर समाज, संस्कृति और समकालीन विषयों को गहराई से समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं।
यह अनुभव उनकी फिल्मों को केवल कलात्मक ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी प्रासंगिक बनाता है।
सिल्वर स्क्रीन के सपने देखने वालों के लिए संदेश
करण समर्थ का संदेश स्पष्ट है—यदि आपके पास बड़े सपने हैं, यदि आप सिल्वर स्क्रीन की दुनिया को केवल ग्लैमर नहीं बल्कि कला और संघर्ष के रूप में देखते हैं, तो आप उनसे जुड़ सकते हैं।
वे नए कलाकारों, लेखकों, अभिनेताओं और रचनात्मक युवाओं को प्रोत्साहित करते हैं कि वे अपने प्रोफाइल और विचार साझा करें। उनके अनुसार प्रतिभा को केवल अवसर की आवश्यकता होती है, और सही मार्गदर्शन मिलने पर कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है।
वे कहते हैं कि सपनों को सच करने के लिए केवल इच्छा नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है।
करण समर्थ आज उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जो प्रसिद्धि से पहले गुणवत्ता को महत्व देती है, प्रचार से पहले सृजन को और व्यवसाय से पहले कला को।
उनका सफर यह बताता है कि सिनेमा केवल बड़े बजट और स्टारडम का खेल नहीं है; यह संवेदनाओं, विचारों और साहस का भी माध्यम है।
गोवा की धरती से उठी उनकी प्रयोगधर्मी फिल्मों की यात्रा आने वाले समय में भारतीय स्वतंत्र सिनेमा को नई दिशा दे सकती है। वे उन कलाकारों में से हैं जो भीड़ में खोने के बजाय अपनी अलग पहचान गढ़ने का साहस रखते हैं।
और शायद यही एक सच्चे फिल्मकार की सबसे बड़ी पहचान भी है—अपनी राह स्वयं बनाना।










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