September 22, 2026 7:09 am

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दीपक की लौ और हमारी सांस्कृतिक संवेदना- डॉ. सत्यवान सौरभ

आप दीप जलाते हैं या नहीं जलाते, यह आपका व्यक्तिगत निर्णय है। किसी धार्मिक परंपरा को मानना, उससे दूरी रखना या अपने तरीके से उसका पालन करना—लोकतांत्रिक समाज में यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का विषय है। लेकिन जब व्यक्तिगत पसंद या राजनीतिक असहमति की अभिव्यक्ति किसी धार्मिक प्रतीक और सांस्कृतिक परंपरा के सार्वजनिक उपहास तक पहुँच जाती है, तब सवाल केवल एक दीपक का नहीं रह जाता। सवाल यह होता है कि असहमति जताते समय हम दूसरों की आस्था और सांस्कृतिक संवेदनाओं का कितना सम्मान करते हैं।

भारतीय संस्कृति में दीपक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। दीपावली का पूरा भाव ही प्रकाश, आशा और अंधकार पर प्रकाश की विजय से जुड़ा है। घर, मंदिर और अनेक शुभ अवसरों पर दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। संध्या समय दीप जलाने की परंपरा भी अनेक भारतीय परिवारों में आज तक दिखाई देती है। इसलिए किसी के लिए दीप केवल तेल, बाती और मिट्टी से बनी वस्तु नहीं है; वह श्रद्धा, शुभता, ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी है।
इसी भाव को संस्कृत की प्रसिद्ध प्रार्थना में व्यक्त किया गया है— “दीपो ज्योति: परं ब्रह्म, दीपो ज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं, संध्यादीप नमोऽस्तुते॥” अर्थात दीपक की ज्योति को परम प्रकाश के रूप में नमन किया गया है और उससे अज्ञान तथा नकारात्मकता दूर होने की कामना की गई है। यही कारण है कि किसी सनातनी परिवार में दीप प्रज्ज्वलित होना केवल एक सामान्य घरेलू गतिविधि नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा संस्कार हो सकता है।
इसलिए दीप जलाना किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए, लेकिन दीप जलाने वाले व्यक्ति की आस्था का मजाक उड़ाना भी उचित नहीं माना जाना चाहिए। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपनी पसंद की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि दूसरे की पसंद और आस्था के सम्मान की जिम्मेदारी भी है। इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि जब किसी धार्मिक प्रतीक को किसी राजनीतिक आयोजन से जोड़ दिया जाता है, तो उस आयोजन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कोई व्यक्ति यह पूछ सकता है कि सार्वजनिक संस्थानों में किसी राजनीतिक कार्यक्रम की भूमिका क्या होनी चाहिए, उसमें भागीदारी स्वैच्छिक है या नहीं और सरकारी संसाधनों का उपयोग किस सीमा तक उचित है।
यहीं राजनीतिक आयोजन की आलोचना और सांस्कृतिक प्रतीक के अपमान के बीच अंतर करना जरूरी हो जाता है। यदि किसी कार्यक्रम में दीप जलाने को लेकर आपत्ति है, तो सवाल कार्यक्रम की राजनीतिक प्रकृति, प्रशासनिक भूमिका, खर्च या सहभागिता के तरीके पर होना चाहिए। स्वयं दीपक, पूजा या सनातन परंपरा को निशाना बनाना बहस को दूसरी दिशा में ले जाता है। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति राजनीतिक आयोजन का विरोध करता है, तो केवल इस आधार पर उसे भारतीय संस्कृति या धर्म-विरोधी कहना भी उचित नहीं होगा।
आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है। इसके साथ एक समस्या भी आई है—व्यंग्य और आलोचना के बीच की सीमा कई बार धुंधली हो जाती है। कुछ शब्द या चित्र कुछ लोगों को सामान्य राजनीतिक व्यंग्य लग सकते हैं, लेकिन वही सामग्री किसी दूसरे व्यक्ति के लिए उसकी आस्था का अपमान महसूस हो सकती है। इसलिए सोशल मीडिया की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक संवेदनशीलता भी जरूरी है।
जन्मदिन पर मोमबत्ती बुझाने की परंपरा का उदाहरण भी इसी संदर्भ में सामने आता है। आज जन्मदिन के अवसर पर केक काटना और मोमबत्तियां बुझाना व्यापक रूप से प्रचलित है। दूसरी ओर, भारतीय धार्मिक परंपरा में दीपक को शुभता और प्रकाश का प्रतीक मानने वाले लोग इसे अलग दृष्टि से देखते हैं। दोनों परंपराओं के सांस्कृतिक संदर्भ अलग हैं। इसलिए किसी एक को अपनाने या दूसरे से दूरी रखने को अपने आप में किसी व्यक्ति की देशभक्ति या संस्कृति के प्रति निष्ठा का प्रमाण नहीं बनाया जाना चाहिए।
फिर भी एक विचारणीय प्रश्न अवश्य है—क्या हम अपनी संस्कृति से जुड़े प्रतीकों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं, जितनी संवेदनशीलता हम दूसरे सांस्कृतिक प्रतीकों के लिए अपेक्षित करते हैं? यदि कोई व्यक्ति दीपावली पर दीप नहीं जलाना चाहता, उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता है। लेकिन यदि कोई दूसरा व्यक्ति पूरे श्रद्धाभाव से दीप जलाता है, तो उसकी आस्था का उपहास क्यों किया जाए? इसी तरह यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक कार्यक्रम में दीप जलाकर सहभागिता करता है, तो उसकी आलोचना कार्यक्रम के राजनीतिक पक्ष पर होनी चाहिए, उसकी धार्मिक आस्था पर नहीं।
राजनीतिक बहस में पूर्व प्रधानमंत्रियों या दूसरे नेताओं के जन्मदिन समारोहों और कथित सरकारी खर्चों के उदाहरण भी दिए जाते हैं। ऐसे आरोपों को प्रमाणित करने के लिए संबंधित वर्ष, खर्च और आधिकारिक दस्तावेज सामने रखना आवश्यक है। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या पूर्व सरकार पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का आरोप लगाना उचित नहीं है। आज की राजनीतिक बहस को मजबूत करने के लिए तथ्य चाहिए, केवल पुराने आरोप नहीं।
वास्तविक प्रश्न कुछ रुपये के तेल और बाती का नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि सार्वजनिक जीवन में हमारी प्राथमिकताएं क्या हों और हमारी भाषा कैसी हो। क्या राजनीतिक मतभेद इतने तीखे हो जाएँ कि सांस्कृतिक प्रतीक भी निशाने पर आ जाएँ? क्या धार्मिक आस्था को राजनीतिक समर्थन का पर्याय मान लेना सही है? क्या दीप जलाने वाला व्यक्ति अनिवार्य रूप से किसी राजनीतिक विचार का समर्थक है? और क्या दीप न जलाने वाला व्यक्ति स्वतः संस्कृति-विरोधी है? इन प्रश्नों का उत्तर यही है कि व्यक्ति की आस्था और राजनीतिक पसंद को अलग-अलग समझना होगा।
दीपक किसी के लिए पूजा है, किसी के लिए परंपरा, किसी के लिए संस्कृति और किसी के लिए केवल प्रकाश। उसकी व्याख्या अलग हो सकती है, लेकिन उसका अपमान किए बिना असहमति व्यक्त करना संभव है। हमारी संस्कृति की शक्ति केवल इस बात में नहीं कि हम दीप जलाते हैं; उसकी शक्ति इस बात में भी है कि हम विविध विचारों के बीच संवाद बनाए रखते हैं। दीप की लौ अंधकार को दूर करती है—उसी तरह विवेक, संयम और तथ्य सार्वजनिक बहस के अंधकार को दूर कर सकते हैं।
इसलिए दीप जलाइए या न जलाइए, यह आपका निर्णय है। किसी राजनीतिक आयोजन का समर्थन कीजिए या विरोध, यह भी आपका अधिकार है। लेकिन आस्था पर व्यंग्य करने से पहले और विरोध करते समय दूसरे की संवेदनाओं को चोट पहुँचाने से पहले इतना जरूर सोचिए—असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, पर सम्मान उसकी मर्यादा।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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