April 10, 2026 10:18 pm

April 10, 2026 10:18 pm

अमीरों का काला खेल: लड़कियों की तस्करी

— डॉ० सत्यवान सौरभ

दुनिया में लड़कियों की तस्करी तेज़ी से बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि हर साल लाखों लोग इस संगठित अपराध का शिकार बनते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की होती है। भारत, रूस, ब्राज़ील जैसे देशों से लड़कियों को अंतरराष्ट्रीय गिरोहों द्वारा बाहर ले जाया जाता है। अमीर और ताक़तवर लोग इन्हें ख़रीदते–बेचते हैं और अपनी विकृत इच्छाओं का साधन बनाते हैं। अमेरिका का जेफरी एपस्टीन मामला इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ सत्ता, पूंजी और अपराध का गठजोड़ खुलकर सामने आया। लेकिन सवाल यह है कि भारत की मुख्यधारा की मीडिया और स्वयं को प्रगतिशील कहने वाले नारीवादी संगठन इस वैश्विक अपराध पर इतनी खामोशी क्यों साधे हुए हैं?

भारत में हर साल मानव तस्करी के हज़ारों मामले दर्ज होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार सात हज़ार से अधिक पीड़ित सामने आते हैं। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और झारखंड से लड़कियों को गोवा, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में भेजा जाता है। अपराध की भयावहता के अनुपात में सज़ा की दर बेहद कम है—दस प्रतिशत से भी नीचे। गरीबी, बेरोज़गारी और अशिक्षा इसके मुख्य कारण हैं। अब तस्कर सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। मासूम बच्चियाँ चैट और झूठे सपनों में फँसा ली जाती हैं।

हरियाणा जैसे राज्यों में लिंगानुपात में हाल के वर्षों में सुधार हुआ है। वर्ष 2025 में प्रति हज़ार लड़कों पर 923 लड़कियों का आँकड़ा एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन इसके बावजूद तस्करी का ख़तरा बना हुआ है। पड़ोसी राज्यों से लड़कियों को लाकर अवैध तरीकों से बेचा जाता है। यह सुधार तब तक अधूरा है, जब तक सुरक्षा और सामाजिक चेतना साथ–साथ नहीं बढ़ती।

हरियाणा का मुरथल कांड (2016) आज भी समाज के ज़मीर पर एक काला धब्बा है। आरक्षण आंदोलन के दौरान महिलाओं के साथ हुए कथित अपराधों को लेकर पंजाब–हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि घटनास्थल से मिले साक्ष्य और गवाहों के बयान गंभीर जांच की माँग करते हैं। इसके बावजूद इस पूरे मामले को राजनीतिक विवाद में बदलकर दबा दिया गया। मीडिया ने इसे लंबे समय तक उठाया नहीं और न ही स्वयंभू नारीवादी समूहों ने इसे अपनी प्राथमिकता बनाया।

तस्करी की शिकार लड़कियों की हालत अमानवीय होती है। उन्हें बंधक बनाया जाता है, पीटा जाता है, मानसिक और शारीरिक यातनाएँ दी जाती हैं। नशे की दवाइयों से सुस्त कर अमीरों की पार्टियों में भेजा जाता है। वहाँ उनका शोषण सत्ता और पैसे की ढाल में होता है। कुछ मामलों में गुप्त अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों और विशिष्ट क्लबों के नाम सामने आते हैं। हर दावा प्रमाणित नहीं होता, कुछ कथाएँ अतिरंजित भी लगती हैं, लेकिन तस्करी का उद्योग पूरी तरह वास्तविक है—और अरबों का काला कारोबार है।

आज का नारीवाद इस मूल प्रश्न से भटकता नज़र आता है। विदेशी फंडिंग से चलने वाले कई संगठन घरेलू महिलाओं की भूमिका को पिछड़ा और दमनकारी बताने में लगे हैं। घर में बच्चों को पालना, परिवार संभालना उन्हें गुलामी दिखता है। लेकिन वही महिला अगर होटल में “जी सर–जी मैडम” कहकर सेवा करे, तो उसे सशक्तिकरण कहा जाता है। यह दोहरा मापदंड क्यों? राष्ट्रीय सर्वेक्षण बताते हैं कि लगभग सत्तर प्रतिशत महिलाएँ घरेलू श्रम में लगी हैं—जो देश की अर्थव्यवस्था की अदृश्य रीढ़ है। फिर भी इस श्रम को अवैतनिक कहकर अपमानित किया जाता है।

यह भ्रम फैलाया गया कि घर में रहने वाली महिला बंधन में है और बाहर काम करने वाली आज़ाद। सच्चाई यह है कि बाहरी दुनिया की तथाकथित आज़ादी अक्सर उम्र और सौंदर्य तक सीमित रहती है। जैसे ही उम्र ढलती है, वही बाज़ार बेरुख़ा हो जाता है। परिवार ही वह संरचना है जो जीवन भर सुरक्षा और सहारा देता है। भारत में तलाक़ की दर आज भी लगभग एक प्रतिशत है, जबकि पश्चिमी देशों में यह भयावह रूप से अधिक है। हमारा सामाजिक ढांचा अभी भी तुलनात्मक रूप से मज़बूत है।

हरियाणा में समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि लंबे समय तक लिंग असंतुलन रहा। अब सुधार के संकेत हैं, लेकिन सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त कुरीतियाँ अब भी मौजूद हैं। बाल विवाह, तस्करी और महिला विरोधी मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली ढाँचों को कानून के दायरे में लाना ज़रूरी है। लोकसंस्कृति परिवार की मज़बूती पर टिकी है—लोकगीतों में माँ और बहन का सम्मान झलकता है। इन्हीं मूल्यों को बचाने की ज़रूरत है।

समाधान साफ़ हैं—कठोर कानून, तेज़ न्याय प्रक्रिया, सीमाओं और हवाई अड्डों पर सख़्त निगरानी, गैर-सरकारी संगठनों की फंडिंग में पारदर्शिता, स्कूलों में जागरूकता, पुलिस को विशेष प्रशिक्षण और समाज की सामूहिक सजगता। तस्करी को नजरअंदाज कर घर–परिवार को तोड़ने वाला विमर्श बंद होना चाहिए। परिवार विरोध नहीं, सुरक्षा है।

लड़कियों की सुरक्षा केवल नारे नहीं, ठोस इच्छाशक्ति माँगती है। तस्करों और उनके अमीर संरक्षकों को उदाहरणात्मक सज़ा दिए बिना यह काला खेल बंद नहीं होगा। सशक्तिकरण का अर्थ विद्रोह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सुरक्षा है। अब भी समय है—अगर समाज सच में जागे।

BabuGiri Hindi
Author: BabuGiri Hindi

बाबूगिरी हिंदी

virender chahal

Our Visitor

2 9 4 9 2 0
Total Users : 294920
Total views : 498841

शहर चुनें