“शरीर स्वयं को ठीक करता है” यह केवल एक भावनात्मक या काव्यात्मक कथन नहीं, बल्कि जीव विज्ञान, आधुनिक चिकित्सा और प्राचीन भारतीय ज्ञान में निहित एक गहरा सत्य है। प्रख्यात शिक्षाविद और शैक्षिक स्तंभकार डॉ. विजय गर्ग ने कहा कि मानव शरीर कोई निर्जीव मशीन नहीं, बल्कि एक जीवित और बुद्धिमान प्रणाली है, जो अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर स्वयं को सुरक्षित करने, मरम्मत करने और पुनर्स्थापित करने की अद्भुत क्षमता रखती है।
डॉ. गर्ग के अनुसार, जन्म के साथ ही शरीर की आत्म-चिकित्सा प्रक्रिया शुरू हो जाती है। त्वचा पर कट लगने पर घाव का अपने आप भरना, हड्डी टूटने पर उसका जुड़ना, संक्रमण के दौरान प्रतिरक्षा कोशिकाओं का बिना किसी सचेत प्रयास के सक्रिय होना—ये सभी शरीर की इसी प्राकृतिक शक्ति के उदाहरण हैं। यहां तक कि कोशिकीय स्तर पर डीएनए की मरम्मत और पुरानी कोशिकाओं का प्रतिस्थापन भी निरंतर चलता रहता है।
उन्होंने बताया कि आधुनिक चिकित्सा में दवाएं, सर्जरी और तकनीकें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर आपात स्थितियों में, लेकिन ये तभी प्रभावी होती हैं जब शरीर स्वयं सहयोग करता है। कोई दवा सीधे बीमारी को नहीं ठीक करती, बल्कि शरीर की अपनी उपचार प्रणाली को सहारा देती है। इसी प्रकार, सर्जन हड्डी को जोड़ता है, लेकिन वास्तविक उपचार शरीर ही करता है।
डॉ. गर्ग ने प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आयुर्वेद और योग जैसी परंपराओं ने सदियों पहले ही शरीर, मन और पर्यावरण के संतुलन के महत्व को समझ लिया था। जब गलत खान-पान, तनाव, नींद की कमी या नकारात्मक भावनाओं से यह संतुलन बिगड़ता है, तब रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिए उपचार का पहला कदम शरीर की प्राकृतिक बुद्धिमत्ता को स्वतंत्र रूप से कार्य करने देना है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मन की भूमिका स्वास्थ्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक शोध अब प्रमाणित कर चुके हैं कि लंबे समय तक बना तनाव प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है और रोगों को बढ़ावा देता है, जबकि सकारात्मक सोच, शांति और आशा से स्वास्थ्य लाभ की गति तेज हो सकती है। प्लेसीबो प्रभाव इसका जीवंत उदाहरण है।
डॉ. गर्ग के अनुसार, जीवनशैली वह माध्यम है जिससे हम रोज़ अपने शरीर से संवाद करते हैं। पौष्टिक आहार शरीर को मरम्मत के लिए आवश्यक पोषक तत्व देता है, पर्याप्त नींद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गति देती है और नियमित व्यायाम रक्त संचार को बेहतर बनाता है। ध्यान, मौन और सचेत श्वास तंत्रिका तंत्र को शांत कर उपचार के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि “शरीर स्वयं को ठीक करता है” का अर्थ चिकित्सा को नकारना नहीं, बल्कि शरीर को एक सक्रिय भागीदार मानना है। बीमारी को केवल दुश्मन न समझकर, उसे शरीर का एक संकेत मानना चाहिए जो बेहतर देखभाल और बदलाव की मांग करता है।
अंत में डॉ. विजय गर्ग ने कहा कि तेज़ रफ्तार जीवन में त्वरित समाधान की चाह के बजाय धैर्य और संतुलन अपनाना आवश्यक है। जब हम शरीर को स्वस्थ आदतें, भावनात्मक संतुलन और समय पर चिकित्सा सहायता प्रदान करते हैं, तब उसकी जन्मजात उपचार शक्ति पूरी तरह प्रकट होती है।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य,
शैक्षिक स्तंभकार एवं प्रख्यात शिक्षाविद
स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर, मलोट (पंजाब)











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