August 5, 2026 8:33 am

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प्रदूषण बढ़ा, लेकिन बजट कम हो गया

डॉ. विजय गर्ग
आज प्रदूषण केवल पर्यावरण तक सीमित समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर संकट बन चुका है। हवा में घुलते विषाक्त कण, जल स्रोतों में रासायनिक अपशिष्ट और मिट्टी में फैलता प्लास्टिक व औद्योगिक कचरा—ये सभी मिलकर जीवन की गुणवत्ता को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं। चिंताजनक तथ्य यह है कि जिस समय प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ रहा है, उसी समय उसे नियंत्रित करने के लिए निर्धारित बजट में कटौती की जा रही है।
शहरों में वाहनों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है। कारखानों से निकलता धुआँ, निर्माण कार्यों की धूल और खुले में कचरा जलाने की प्रवृत्ति वायु को जहरीला बना रही है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से पानी और मिट्टी प्रदूषित हो रही है। ऐसे हालात में सरकारों से अपेक्षा होती है कि वे पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराएँ।
लेकिन जब पर्यावरण से जुड़े विभागों का बजट घटा दिया जाता है, तो निगरानी प्रणालियाँ कमजोर पड़ जाती हैं। प्रदूषण मापने वाले स्टेशनों की संख्या सीमित हो जाती है, सफाई और संरक्षण अभियान अधूरे रह जाते हैं और जन-जागरूकता कार्यक्रमों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, कानून मौजूद होने के बावजूद उनका प्रभावी क्रियान्वयन संभव नहीं हो पाता।
प्रदूषण का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। श्वसन रोग, हृदय संबंधी बीमारियाँ और त्वचा रोगों में लगातार वृद्धि हो रही है। इलाज पर बढ़ता खर्च आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालता है। यदि पर्यावरण संरक्षण के लिए बजट में कटौती जारी रही, तो दीर्घकाल में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च कई गुना बढ़ जाएगा।
इस समस्या का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी से संभव है। सरकार को चाहिए कि वह पर्यावरण संरक्षण के लिए पर्याप्त धनराशि सुनिश्चित करे, सख्त निगरानी व्यवस्था लागू करे और हरित प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन दे। वहीं, नागरिकों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी—प्लास्टिक का उपयोग कम करना, अधिक से अधिक पौधारोपण करना और सार्वजनिक परिवहन को अपनाना जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
अंततः, प्रदूषण बढ़ रहा है और बजट घट रहा है—यह एक बेहद चिंताजनक वास्तविकता है। यदि आज हमने पर्यावरण में निवेश नहीं किया, तो भविष्य में इसकी कीमत कहीं अधिक चुकानी पड़ेगी। स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और स्वस्थ पृथ्वी केवल हमारा अधिकार नहीं, बल्कि हमारी साझा जिम्मेदारी भी है।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य एवं शैक्षिक स्तंभकार, मलोट (पंजाब)

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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