चंडीगढ़ | 16 फरवरी, 2026। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सांसद व महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने अमेरिका-भारत व्यापार समझौते को लेकर केंद्र की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से कड़ा बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि देशहित, किसान की रोज़ी-रोटी, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल स्वायत्तता और संप्रभुता से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुरजेवाला ने सवाल उठाया—यह ‘मजबूत सरकार’ है या ‘मजबूर सरकार’? क्या यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ है या ‘अमेरिका-निर्भर भारत’?
व्यापार समझौते पर बुनियादी आपत्ति
सुरजेवाला ने कहा कि व्यापार समझौते बराबरी और परस्पर लोकहित पर आधारित होते हैं। संप्रभुता गिरवी रखकर किया गया कोई भी समझौता गुलामी की ओर ले जाता है, जिसे 144 करोड़ भारतीय कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
(I) खेत-खलिहान-किसान से विश्वासघात
ड्यूटी-फ्री आयात से किसान पर सीधा असर
6 फरवरी, 2026 के ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ में भारत द्वारा अमेरिका के खाद्य व कृषि उत्पादों के लिए बिना आयात शुल्क बाजार खोलने की सहमति दी गई।
DDG (प्रोसेस्ड मक्का), ज्वार, सोयाबीन ऑयल जैसे उत्पादों के ड्यूटी-फ्री आयात से देश के मक्का, ज्वार और सोयाबीन किसानों की आय पर सीधा प्रहार होगा।
भारत जहां सीमित उत्पादन करता है, वहीं अमेरिका का उत्पादन कई गुना अधिक है—ऐसे में सस्ता आयात घरेलू बाजार को ध्वस्त करेगा।
कपास पर ‘डबल मार’
9 फरवरी, 2026 को अमेरिका-बांग्लादेश समझौते से अमेरिकी कपास/धागे से बने वस्त्रों पर अमेरिका में जीरो शुल्क की व्यवस्था की गई, जबकि भारतीय निर्यात पर 18% शुल्क रहेगा—इससे तिरुपुर, सूरत, पानीपत, लुधियाना सहित वस्त्र उद्योग प्रभावित होगा।
12 फरवरी, 2026 को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान के बाद भारत में अमेरिकी कपास के निशुल्क आयात का रास्ता खुला।
2024-25 में अमेरिका से कपास आयात के चलते देश में कपास के दाम MSP से ₹1,000 प्रति क्विंटल तक गिरे—अब आयात बढ़ा तो महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, एमपी, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब सहित कपास किसान बुरी तरह प्रभावित होंगे।
भारत से बांग्लादेश को होने वाला सालाना 2.7 बिलियन डॉलर का कपास/धागा निर्यात भी खतरे में है।
‘एडिशनल प्रोडक्ट्स’ पर संदेह
समझौते में ‘अतिरिक्त उत्पाद’ शब्द से किन-किन अनाजों का आयात होगा—सरकार स्पष्ट करे।
GM कृषि उत्पादों पर खतरा
भारत GM फसलों के आयात की अनुमति नहीं देता ताकि बीज शुद्धता और जैव विविधता सुरक्षित रहे।
प्रोसेस्ड मक्का, ज्वार, सोयाबीन के आयात से GM उत्पादों के ‘पिछले दरवाजे’ से आने की आशंका है—क्या इसका आकलन हुआ?
‘नॉन-टैरिफ बैरियर’ हटाने का मतलब
किसान सब्सिडी पर कैंची और GM Crops को बढ़ावा।
अमेरिका जहां अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है, वहीं भारत में पहले से ही किसान पर लागत का बोझ है—बची-खुची राहत हटाना वज्रपात होगा।
(II) भारत की ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़
6 फरवरी के बाद अमेरिकी आदेशों/फैक्ट शीट में यह शर्त दोहराई गई कि भारत रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदेगा; उल्लंघन पर पैनल्टी की चेतावनी।
14 फरवरी, 2026 को म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने यही बात सार्वजनिक रूप से कही।
पहले ही ईरान से तेल खरीद पर रोक स्वीकार की जा चुकी है, जबकि ईरान रुपये में तेल देता था।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा रूस-ईरान से सस्ते दामों पर लेता रहा—जिससे अरबों डॉलर की बचत हुई। अब महंगे अमेरिकी तेल की बाध्यता क्या संप्रभुता से समझौता नहीं?
(III) 5 साल में 500 बिलियन डॉलर की खरीद—बराबरी या मजबूरी?
2024 में भारत-अमेरिका व्यापार में भारत का सरप्लस था।
13 फरवरी, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के साझा बयान में ‘परस्पर व्यापार’ 500 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने की बात थी।
लेकिन 6 फरवरी, 2026 के समझौते में भारत पर अगले 5 वर्षों में हर साल 100 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने की शर्त—कुल 500 बिलियन—थोपी गई।
सवाल—यह बराबरी का समझौता है या जबरदस्ती?
सुरजेवाला ने कहा, “देश जवाब मांगता है।” किसान, उद्योग, ऊर्जा सुरक्षा और संप्रभुता पर पड़ने वाले असर को लेकर सरकार तत्काल श्वेत पत्र जारी करे और संसद में जवाब दे।












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