चंडीगढ़, 2 फरवरी। लोकसभा में सांसद दीपेन्द्र हुड्डा द्वारा पूछे गए एक अहम सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी या सह-मेजबानी के लिए हरियाणा सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया है। सरकार के इस जवाब के बाद हरियाणा की खेल नीति और इच्छाशक्ति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि 1982 एशियाड और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली में हुए व्यापक विकास का सीधा लाभ हरियाणा को मिला था। सड़कों, फ्लाईओवरों और आधारभूत ढांचे पर हुए निवेश से पूरे एनसीआर क्षेत्र का कायाकल्प हुआ। अब कॉमनवेल्थ खेल 2030 और ओलंपिक 2036 की तैयारियों के नाम पर गुजरात में बड़े पैमाने पर विकास होगा, लेकिन हरियाणा इससे पूरी तरह बाहर नजर आ रहा है।
“पदक हरियाणा देता है, इनाम दूसरे राज्य ले जाते हैं”
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश को सबसे अधिक पदक दिलाने वाला राज्य हरियाणा आज भी बुनियादी खेल अवसंरचना से जूझ रहा है। खिलाड़ी जर्जर स्टेडियमों और असुरक्षित ढांचों में अभ्यास करने को मजबूर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है कि 2036 ओलंपिक को लेकर गुजरात सरकार ने प्रस्ताव दिया, जबकि हरियाणा सरकार ने अपने खिलाड़ियों की ऐतिहासिक उपलब्धियों के बावजूद कोई ठोस पहल नहीं की।
हुड्डा ने इसे हरियाणा सरकार की खेल विरोधी मानसिकता और प्रशासनिक अक्षमता का प्रमाण बताया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले सोनीपत की रेल कोच फैक्ट्री और महम का प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट भी दूसरे राज्यों को चला गया, जबकि हरियाणा सरकार मूकदर्शक बनी रही।
सह-मेजबान बनाने और विशेष पैकेज की मांग
दीपेन्द्र हुड्डा ने मांग की कि कॉमनवेल्थ खेल 2030 और ओलंपिक 2036 के लिए हरियाणा को सह-मेजबान या प्रमुख स्थल के रूप में तुरंत प्रस्तावित किया जाए।
प्रदेश में विश्वस्तरीय खेल अवसंरचना और ओलंपिक-स्तरीय स्टेडियमों के निर्माण के लिए विशेष पैकेज घोषित किया जाए।
हरियाणा सरकार यह स्पष्ट करे कि उसने इन अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों की मेजबानी या सह-मेजबानी के लिए अब तक क्या प्रयास किए हैं।
2.5% आबादी, लेकिन सबसे बड़ा योगदान
सांसद ने कहा कि देश की केवल करीब 2.5 प्रतिशत आबादी वाला हरियाणा, ओलंपिक, एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के पदकों का सबसे बड़ा हिस्सा जीतकर लाता है। मिट्टी के अखाड़ों से निकलकर हरियाणा के खिलाड़ी देश का नाम रोशन करते हैं, लेकिन जब प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का अवसर आता है, तो सरकार पूरी तरह विफल साबित होती है।
संसद में सरकार के जवाब से यह साफ हो गया है कि देश को सर्वाधिक पदक दिलाने वाले हरियाणा को न मेजबान, न सह-मेजबान और न ही किसी श्रेणी में गंभीरता से विचार योग्य समझा गया—जो प्रदेश के खिलाड़ियों और युवाओं के साथ अन्याय है।











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