(98% तक रोके जा सकने वाली बीमारी, फिर भी क्यों मर रही हैं महिलाएँ?)
-डॉ. प्रियंका सौरभ
यह बीमारी न तेज़ दर्द से दस्तक देती है, न बुखार या किसी बड़े लक्षण से। यह धीरे-धीरे, चुपचाप शरीर के भीतर पनपती है और जब तक इसका अहसास होता है, तब तक कई बार बहुत देर हो चुकी होती है। सर्वाइकल कैंसर इसी तरह महिलाओं की ज़िंदगी को निगल रहा है। यह कोई नई बीमारी नहीं है, न ही दुर्लभ, लेकिन इसके बावजूद आज भी यह भारत में महिलाओं के लिए सबसे बड़े स्वास्थ्य खतरों में से एक बना हुआ है।
भारत में महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर दूसरा सबसे आम कैंसर है। हर साल लगभग 80 हजार नए मामले सामने आते हैं और 42 हजार से अधिक महिलाओं की मौत इसी बीमारी की वजह से हो जाती है। अगर वैश्विक आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति और भयावह नज़र आती है। दुनिया भर में हर साल करीब छह लाख नए मामले सामने आते हैं और लगभग तीन लाख महिलाओं की जान चली जाती है। यानी हर आठ मिनट में एक महिला इस बीमारी की भेंट चढ़ जाती है। यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि हर आंकड़े के पीछे एक परिवार, एक मां, एक बेटी, एक बहन की कहानी छिपी है।
सर्वाइकल कैंसर का सबसे बड़ा कारण ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी HPV है। यह एक बेहद सामान्य वायरस है, जो यौन संपर्क के ज़रिये फैलता है। दुनिया की अधिकांश महिलाएं अपने जीवन में कभी न कभी इस वायरस के संपर्क में आती हैं, लेकिन सभी में कैंसर नहीं होता। समस्या तब शुरू होती है जब यह वायरस लंबे समय तक शरीर में बना रहता है और समय रहते इसकी पहचान नहीं हो पाती। यही वह बिंदु है जहां जागरूकता और जांच की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
विडंबना यह है कि जिस बीमारी से 98 प्रतिशत तक बचाव संभव है, वही बीमारी इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की जान ले रही है। इसका कारण इलाज की कमी नहीं, बल्कि जानकारी और जागरूकता की भारी कमी है। आज भी भारत के बड़े हिस्से में महिलाएं सर्वाइकल कैंसर के नाम से तक परिचित नहीं हैं। उन्हें यह नहीं पता कि यह बीमारी क्या है, कैसे होती है, इसके शुरुआती संकेत क्या हो सकते हैं और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है। सामाजिक संकोच, स्वास्थ्य पर खुलकर बात न करने की प्रवृत्ति और महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता न देना इस समस्या को और गंभीर बना देता है।
सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय के निचले हिस्से, यानी ग्रीवा में होता है। शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण बेहद हल्के या लगभग न के बराबर होते हैं। कई बार मामूली रक्तस्राव, असामान्य डिस्चार्ज या हल्का दर्द जैसे संकेत दिखाई देते हैं, जिन्हें महिलाएं सामान्य समझकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं। यही लापरवाही बाद में जानलेवा साबित होती है। अगर समय रहते जांच हो जाए तो इस कैंसर को शुरुआती अवस्था में ही रोका जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश मामले तब सामने आते हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।
HPV वैक्सीन इस दिशा में एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई है। यह वैक्सीन लड़कियों को किशोरावस्था में लगाए जाने पर उन्हें इस वायरस से काफी हद तक सुरक्षित कर सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे सर्वाइकल कैंसर से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मानती हैं। इसके बावजूद भारत में टीकाकरण की रफ्तार बेहद धीमी रही है। कई परिवारों में अब भी वैक्सीन को लेकर भ्रांतियां हैं, कहीं सामाजिक वर्जनाएं आड़े आती हैं तो कहीं जानकारी का अभाव।
हाल के दिनों में कुछ राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए कदम उम्मीद जगाते हैं। हिमाचल प्रदेश में 65 हजार बेटियों को HPV वैक्सीन देने की घोषणा इसी दिशा में एक सकारात्मक पहल है। यह कदम सिर्फ एक राज्य तक सीमित न रहकर पूरे देश में एक उदाहरण बन सकता है। लेकिन सिर्फ टीकाकरण ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ नियमित स्क्रीनिंग, पैप स्मियर टेस्ट और महिलाओं को अपने शरीर के प्रति सजग बनाने की ज़रूरत है।
सर्वाइकल कैंसर सिर्फ एक मेडिकल समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक समस्या भी है। जब महिलाओं की सेहत को परिवार और समाज में प्राथमिकता नहीं मिलती, तब ऐसी बीमारियां खामोशी से जड़ें जमा लेती हैं। आज भी कई जगहों पर महिलाएं अपने स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बात नहीं कर पातीं। जांच कराने में झिझक, डॉक्टर के पास जाने में संकोच और घरेलू जिम्मेदारियों को खुद से ऊपर रखना उन्हें जोखिम में डाल देता है।
नीति-निर्माताओं और स्वास्थ्य तंत्र की भूमिका भी यहां बेहद अहम हो जाती है। सरकारी अस्पतालों में सस्ती और सुलभ जांच सुविधाएं, ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान और स्कूल स्तर से ही स्वास्थ्य शिक्षा को मज़बूत करना समय की मांग है। जब तक सर्वाइकल कैंसर को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक इसके आंकड़े डराते रहेंगे।
मीडिया की भूमिका भी कम नहीं है। जिस तरह अन्य बीमारियों पर बड़े अभियान चलाए जाते हैं, उसी तरह सर्वाइकल कैंसर पर भी निरंतर और संवेदनशील चर्चा की ज़रूरत है। डर फैलाने के बजाय सही जानकारी देना, मिथकों को तोड़ना और महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग बनाना ही इसका उद्देश्य होना चाहिए।
यह समझना ज़रूरी है कि सर्वाइकल कैंसर कोई अभिशाप नहीं है। यह एक रोकी जा सकने वाली बीमारी है। सही समय पर टीकाकरण, नियमित जांच और जागरूकता से इसे जड़ से खत्म किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए समाज को अपनी सोच बदलनी होगी। महिलाओं के स्वास्थ्य को सिर्फ उनका निजी मामला मानने के बजाय इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा बनाना होगा।
हर आठ मिनट में एक महिला की मौत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता की याद दिलाती है। अगर आज हम नहीं चेते, अगर आज भी लापरवाही जारी रही, तो यह खामोश कातिल और ज़िंदगियां छीनता रहेगा। अब वक्त आ गया है कि सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों की बेटियों को यह डर विरासत में न मिले।













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