कपास, सोयाबीन, मक्का और सेब से शुरुआत, अंततः कृषि व डेयरी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने की साज़िश
भाकियू का आह्वान : गांव-गांव अभियान चलाकर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के इस्तीफे की मांग तेज की जाए
चंडीगढ़ 15 फरवरी।भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष रतनमान ने वाणिज्य मंत्री द्वारा दिए गए उस बयान का कड़ा विरोध किया है,। जिसमें कहा गया कि “अगर हम अमेरिका से कच्चा माल खरीदेंगे, तो अंतरिम समझौते के अंतिम रूप लेने पर भारत को भी शून्य शुल्क पर निर्यात की सुविधा मिलेगी।” रतनमान ने कहा कि यह बयान मोदी सरकार की आत्मनिर्भरता की सच्चाई उजागर करता है और यह दर्शाता है कि सरकार अमेरिका के दबाव में कृषि क्षेत्र को खुला बाजार बनाने की तैयारी कर चुकी है।उन्होंने कहा कि ‘अमेरिका व्यापार समझौते से कृषि को बाहर रखा गया है’ का दावा पूरी तरह भ्रामक है। दरअसल, मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के माध्यम से देश की कृषि, डेयरी और प्राकृतिक संसाधनों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। भाजपा सरकार भारत को विदेशी उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड और कॉरपोरेट लूट का बाजार बनाना चाहती है।रतनमान ने कहा कि शून्य शुल्क पर कच्चे कपास का आयात देश के कपास किसानों को बर्बाद कर देगा। वर्ष 2025 के खरीफ सीजन में C2+50% के आधार पर कपास का एमएसपी ₹10,075 प्रति क्विंटल बनता है। जबकि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने A2+FL के आधार पर ₹7,710 प्रति क्विंटल घोषित किया, जो C2 फार्मूले से ₹2,365 कम है। प्रभावी खरीद व्यवस्था के अभाव में किसानों को ₹5,500 से ₹6,500 प्रति क्विंटल की संकटग्रस्त कीमत पर फसल बेचने को मजबूर होना पड़ा। 19 अगस्त 2025 को कपास पर 11% आयात शुल्क हटाने से लाखों किसान परिवारों की आजीविका और संकट में आ गई। अमेरिका से कपास आयात जनवरी–नवंबर 2024 में 199.30 मिलियन डॉलर से बढ़कर जनवरी–नवंबर 2025 में 377.90 मिलियन डॉलर हो गया। जो 95.5% की वृद्धि दर्शाता है।उन्होंने कहा कि अब सरकार “घरेलू बाजार को स्थिर करने” के नाम पर 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं के निर्यात का आदेश दे रही है। कच्चे कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात बिना किसी घरेलू औद्योगीकरण रणनीति के करना खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालने जैसा है। इससे भारतीय किसान और खेत मजदूर वैश्विक बाजार की अनिश्चितता के सबसे बड़े शिकार बनेंगे।भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के तहत सेब, कपास, वृक्षीय मेवे, सोयाबीन तेल, वाइन एवं स्पिरिट, मक्का और लाल ज्वार आधारित डीडीजी सहित पशु आहार के आयात को खोल दिया गया है। वहीं डेयरी उत्पादों को यूरोपीय संघ, न्यूज़ीलैंड और यूनाइटेड किंगडम के साथ हुए समझौतों में शामिल किया गया है। यह नीति किसानों, मजदूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हितों के खिलाफ है।रतनमान ने कहा कि 30% से 150% तक के आयात शुल्क को घटाकर शून्य करना और निर्यात शुल्क में भारी वृद्धि जैसे निर्णय संसद को विश्वास में लिए बिना किए गए हैं। सभी फसलों पर C2+50% के आधार पर गारंटीकृत एमएसपी कानून लागू न करना पहले ही किसानों के साथ अन्याय है। अब शुल्क सुरक्षा भी समाप्त कर किसानों को असुरक्षा में धकेला जा रहा है, जिसे देश की जनता स्वीकार नहीं करेगी।उन्होंने बताया कि 12 फरवरी 2026 की अखिल भारतीय आम हड़ताल ने देशभर में जनाक्रोश का स्पष्ट संदेश दिया है। फिर भी केंद्र सरकार किसानों की आवाज सुनने को तैयार नहीं है।भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष रतनमान ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए किसानों से आह्वान किया कि वे लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहें। गांव-गांव सभाएं, प्रदर्शन और घर-घर संपर्क अभियान चलाकर कृषि और डेयरी की रक्षा के लिए जनसमर्थन जुटाया जाए।आगामी 24 फरवरी को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में होने वाली राष्ट्रीय बैठक में आंदोलन को तेज करने के लिए ठोस कार्यक्रम तय किए जाएंगे।











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