मानव कल्याण को पूरा जीवन समर्पित करने वाले महानायक थे पंडित दीनदयाल उपाध्यायलेखकपंडित मोहनलाल बडौली प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा -हरियाणा
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल एक महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि अर्पित करना नहीं है, बल्कि भारत की उस वैचारिक परंपरा को नमन करना है, जिसने राष्ट्र, समाज और मानव के समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। पंडित जी उन विरल चिंतकों में से थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा और सामाजिक उत्थान का माध्यम माना।पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में हुआ। अल्पायु में माता-पिता का साया उठ जाने के बावजूद उन्होंने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की और असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। छात्र जीवन से ही उनका झुकाव राष्ट्र और समाज के प्रति था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का सबसे बड़ा वैचारिक योगदान “एकात्म मानववाद” है। यह विचारधारा भारत की अपनी सांस्कृतिक चेतना से निकली हुई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत की समस्याओं का समाधान न तो पश्चिमी पूंजीवाद में है और न ही साम्यवाद में। भारत को अपना विकास मॉडल स्वयं गढ़ना होगा, जो उसकी परंपरा, संस्कृति और सामाजिक संरचना के अनुरूप हो।एकात्म मानववाद के अनुसार मानव केवल आर्थिक प्राणी नहीं है। वह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित स्वरूप है। इसलिए विकास की कोई भी नीति तभी सार्थक हो सकती है, जब वह मानव के समग्र विकास को ध्यान में रखे। पंडित जी व्यक्ति और समाज, अधिकार और कर्तव्य, भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन को ही सच्ची प्रगति मानते थे।उनका “अंत्योदय” का सिद्धांत इसी सोच की स्वाभाविक परिणति है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया। गरीब, किसान, मजदूर, वंचित और शोषित वर्ग के बिना राष्ट्र निर्माण की कल्पना अधूरी है।राजनीतिक जीवन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ के वैचारिक स्तंभ रहे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सिखाया कि राजनीति में शुचिता, अनुशासन और सेवा भाव अनिवार्य है। वे कहते थे कि सत्ता साध्य नहीं, साधन है। उनका जीवन इस सिद्धांत का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने कभी पद या प्रतिष्ठा को महत्व नहीं दिया, बल्कि संगठन और विचार को सर्वोपरि रखा।पंडित जी की सादगी, ईमानदारी और त्याग आज भी राजनीति के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वे न्यूनतम साधनों में जीवन यापन करते थे और कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करते थे। उनके लिए राष्ट्रहित सर्वोच्च था और व्यक्तिगत स्वार्थ का कोई स्थान नहीं था।उनकी राष्ट्रभक्ति भावनाओं से नहीं, बल्कि गहरे विचार और विवेक से संचालित थी। वे भारतीय संस्कृति को केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति मानते थे। गांव, किसान, कुटीर उद्योग, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता उनके चिंतन के केंद्र में थे।11 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का असामयिक निधन राष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। लेकिन उनके विचार समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होते गए। आज “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” जैसी अवधारणाएं पंडित जी के एकात्म मानववाद और अंत्योदय दर्शन की ही आधुनिक अभिव्यक्ति हैं। भारतीय जनता पार्टी पंडित उपाध्याय जी की अंत्योदय, जनकल्याण और राष्ट्र तथा समाज के प्रति समर्पण भाव को देखते हुए 11 फरवरी को उनकी पुण्य तिथि को समर्पण दिवस के रूप में मना रही है।आज जब देश आत्मनिर्भर भारत, गरीब कल्याण, किसान सम्मान और अंतिम व्यक्ति तक विकास की बात करता है, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का चिंतन हमारी नीतियों और कार्यक्रमों की प्रेरणा बनता है। उनका दर्शन हमें याद दिलाता है कि सच्चा विकास वही है जो समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले।पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर हमारा संकल्प होना चाहिए कि हम उनके विचारों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण, राजनीति और सामाजिक जीवन में उतारें। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही सशक्त, समरस और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का मार्ग है।











Total Users : 291434
Total views : 493779