September 22, 2026 11:28 am

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महिला दिवस विशेष: लिवर डोनर से काउंसलर तक, रूपा अरोड़ा की प्रेरणादायक यात्रा

चंडीगढ़: International Women’s Day के अवसर पर Chandigarh की अध्यापिका और सामाजिक कार्य परामर्शदाता रूपा अरोड़ा की कहानी साहस, सेवा और मानवता का प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आई है। उन्होंने करीब 15 साल पहले अपने पति को नया जीवन देने के लिए अपने लिवर का 65 प्रतिशत हिस्सा दान किया था। आज वह एक लिविंग लिवर डोनर होने के साथ-साथ सामाजिक कार्य परामर्शदाता (MSW) के रूप में लिवर ट्रांसप्लांट से गुजर रहे मरीजों और उनके परिवारों का मार्गदर्शन कर रही हैं।
रूपा अरोड़ा चंडीगढ़ प्रशासन के सरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं। अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर वह लोगों को समझाती हैं कि लिवर ट्रांसप्लांट केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक यात्रा भी होती है। उनका कहना है कि ट्रांसप्लांट से पहले मरीज और परिवार को सही जानकारी और काउंसलिंग मिलना बेहद जरूरी है।
डर और भ्रम को दूर करना जरूरी
रूपा अरोड़ा बताती हैं कि ट्रांसप्लांट का नाम सुनते ही मरीज और परिवार के मन में कई सवाल और डर पैदा हो जाते हैं—क्या ऑपरेशन सफल होगा, क्या डोनर सुरक्षित रहेगा और क्या मरीज सामान्य जीवन जी पाएगा। ऐसे समय में डॉक्टरों और काउंसलरों की जिम्मेदारी होती है कि वे पूरी प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाकर मरीज और परिवार का आत्मविश्वास बढ़ाएं।
डोनर का निर्णय प्रेम और साहस का प्रतीक
उनके अनुसार लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट में कोई व्यक्ति अपने शरीर का एक हिस्सा देकर दूसरे को जीवन देता है। यह केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि मानवीय संवेदना और साहस का प्रतीक है। डोनर बनने से पहले व्यक्ति और उसके परिवार को पूरी जानकारी और मानसिक तैयारी होना जरूरी है, ताकि निर्णय पूरी समझ और स्वेच्छा से लिया जा सके।
परिवार की भूमिका अहम
रूपा अरोड़ा कहती हैं कि ट्रांसप्लांट के बाद मरीज की देखभाल में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। नियमित दवाइयाँ, समय-समय पर जांच और जीवनशैली में बदलाव के लिए परिवार का सहयोग मरीज की रिकवरी को तेज और बेहतर बनाता है।
ट्रांसप्लांट के बाद अनुशासन जरूरी
उनका कहना है कि कई लोग मानते हैं कि ऑपरेशन के बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि ट्रांसप्लांट के बाद अनुशासन और सावधानी पहले से भी ज्यादा जरूरी होती है। संतुलित आहार, संक्रमण से बचाव और डॉक्टर से नियमित परामर्श नए जीवन को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।
अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत
रूपा अरोड़ा का मानना है कि भारत में आज भी कई मरीज केवल इसलिए अपनी जान गंवा देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर अंग नहीं मिल पाता। यदि समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़े, तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि अंगदान वास्तव में महादान है, जो किसी को नया जीवन दे सकता है।
आशा और मानवता की मिसाल
रूपा अरोड़ा का व्यक्तिगत अनुभव और काउंसलिंग कार्य यह संदेश देता है कि लिवर ट्रांसप्लांट केवल चिकित्सा का विषय नहीं बल्कि आशा, साहस और मानवता की कहानी है। सही जानकारी, काउंसलिंग और पारिवारिक सहयोग मिलने पर मरीज ट्रांसप्लांट के बाद एक स्वस्थ और सार्थक जीवन जी सकता है।
अंत में उन्होंने समाज से आह्वान किया—
“अंगदान करें, जीवन बचाएँ।”

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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